Sunday, October 12, 2014

कशिश

कशिश कितनी है तेरी सादगी में 
दीवानों की महफ़िल में आके देख 
तड़प देखनी है गर तुझे मेरी
तो ज़रा नज़र चुरा के देख

Wednesday, October 8, 2014

दास्ताँ -ए-ज़िन्दगी

जुबां खामोश आँखों में नमी होगी 
यही बस मेरी दास्ताँ -ए-ज़िन्दगी होगी 
भरने को तो हर ज़ख़्म भर जायेगा 
कैसे भरेगी वो जगह जहा तेरी कमी होगी।