Wednesday, November 11, 2015

दीपावली

दीपावली की रौशनी मुबारक हो आप को
खुशनुँमा यह जिन्दगी मुबारक हो आप को
हो खुशियोंका उजाला, रिश्तों में रौशनी
दिलों में बसी दोस्ती ,मुबारक हो आप को
प्रीत के प्रकाश में संबंधों में और बढ़े सुगंध
दुनिया की हर खुशी ,मुबारक हो आप को
न रहे धन का आभाव न कमी साधनों की
चाह से बढकर तरक्की मुबारक हो आप को
गम लाख ढूंढे उसे आपका पता नहीं मिले
हर लम्हें की हर ख़ुशी मुबारक हो आपको
दिल दिया बना जज्बात को बना के तेल
ऐसी मने यह दीवाली मुबारक हो आपको

Sunday, October 25, 2015

तमाशा

अब मैं आपको
कोई कविता नहीं सुनाता
एक तमाशा दिखाता हूं,
और आपके सामने
एक मजमा लगाता हूं।
ये तमाशा
कविता से बहुत दूर है,
दिखाऊं साब, मंज़ूर है?
कविता सुननेवालो
ये मत कहना
कि कवि होकर
मजमा लगा रहा है,
और कविताएं सुनाने के बजाय
यों ही बहला रहा है।
दरअसल
पापी पेट का सवाल है
और देश का ये हाल है
कि कवि अब
मजमा लगाने को मजबूर है,
तो दिखाऊं साब, मंज़ूर है?
बोलिए जनाब
बोलिए हुज़ूर,
तमाशा देखना मंज़ूर?
थैंक्यू, धन्यवाद, शुक्रिया,
आपने 'हां' कही
बहुत अच्छा किया।
आप अच्छे लोग हैं
बहुत अच्छे श्रोता हैं
और तमाशबीन भी ख़ूब हैं,
देखिए मेरे हाथ में
ये तीन टैस्ट-ट्यूब हैं।
कहां हैं!!!
ग़ौर से देखिए
ध्यान से देखिए,
मन की आंखों से
कल्पना की पांखों से देखिए
देखिए यहां हैं।
क्या कहा, उंगलियां हैं?
नहीं-नहीं टैस्ट-ट्यूब हैं
इन्हें उंगलियां मत कहिए
तमाशा देखते वक़्त
दरियादिल रहिए।
आप मेरे श्रोता हैं, पाठक हैं
रहनुमा हैं, सुहाग हैं
मेरे महबूब हैं
अब बताइए ये क्या हैं?
--तीन..... टैस्ट-ट्यूब हैं।
वैरी गुड, थैंक्यू
धन्यवाद, शुक्रिया
आपने उंगलियों को
टैस्ट-ट्यूब बताया
बहुत अच्छा किया।
अब बताइए इनमें क्या है
बताइए-बताइए
इनमें क्या है?
अरे, आपको क्या हो गया है?
टैस्ट-ट्यूब दिखती है
अंदर का माल नहीं दिखता है,
आपके भोलेपन में भी
अधिकता है।
ख़ैर छोड़िए
ए भाईसाहब!
अपना ध्यान इधर मोड़िए।
चलिए, मुद्दे पर आता हूं,
मैं ही बताता हूं
इनमें ख़ून है!
हां भाईसाहब
हां बिरादर,
हां माई बाप
हां गॉड़फ़ादर!
इनमें ख़ून है।
पहले में हिंदू का
दूसरे में मुसलमान का
तीसरे में सिख का ख़ून है,
और इन तीनों में ही
बड़ा जुनून है।
आप में से जो भी
इनका फ़र्क़ बताएगा
मेरा आज का
पारिश्रमिक ले जाएगा।
हर किसी को
बोलने की आज़ादी है,
खरा खेल फ़रक्खाबादी है।
न जालसाज़ी है न धोखा है,
ले जाइए, पूरा पैसा ले जाइए
जनाब, मौक़ा है।
फ़र्क़ बताइए,
तीनों में अंतर क्या है
अपना तर्क बताइए,
और एक कवि का
पारिश्रमिक ले जाइए।
आप बताइए
नीली कमीज़ वाले साब,
सफ़ेद कुर्ते वाले जनाब।
आप बताइए
जिनकी इतनी बड़ी दाढ़ी है।
आप बताइए बहन जी
जिनकी पीली साड़ी है।
संचालक जी आप बताइए
आपके भरोसे हमारी गाड़ी है।
इनके मुंह पर नहीं
पेट में दाढ़ी है।
ओ श्रीमान जी,
आपका ध्यान किधर है,
इधर देखिए
तमाशे वाला तो इधर है।
हां, तो
दोस्तो!
फ़र्क़ है,
ज़रूर इनमें फ़र्क़ है,
तभी तो
समाज का बेड़ाग़र्क है।
रगों में शांत नहीं रहता है,
उबलता है
धधकता है
फूट पड़ता है
सड़कों पर बहता है।
फ़र्क़ नहीं होता
तो दंगे-फ़साद नहीं होते,
फ़र्क़ नहीं होता
तो ख़ून-ख़राबों के बाद
लोग नहीं रोते।
अंतर नहीं होता
तो गर्म हवाएं नहीं होतीं,
अंतर नहीं होता
तो अचानक विधवाएं नहीं होतीं।
देश में हर तरफ़
हत्याओं का मानसून है,
ओलों की जगह
हड्डियां हैं
पानी की जगह ख़ून है।
फ़साद करने वाले ही बताएं
अगर उनमें थोड़ी-सी हया है,
क्या उन्हें सांप सूंघ गया है?
और ये तो मैंने आपको
पहले ही बता दिया
कि पहली में हिंदू का
दूसरी में मुसलमान का
तीसरी में सिख का ख़ून है।
अगर उल्टा बता देता
तो कैसे पता लगाते,
कौन-सा किसका है
कैसे बताते?
और दोस्तो,
डर मत जाना अगर डरा दूं,
मान लो मैं इन्हें
किसी मंदिर, मस्जिद
या गुरुद्वारे के सामने गिरा दूं,
तो है कोई माई का लाल
जो फ़र्क़ बता दे,
है कोई पंडित
है कोई मुल्ला
है कोई ग्रंथी
जो ग्रंथियां सुलझा दे?
फ़र्श पर बिखरा पड़ा है
पहचान बताइए,
कौन मलखान, कौन सिंह
कौन ख़ान बताइए!
अभी फ़ोरैन्सिक विभाग वाले आएंगे
जमे हुए ख़ून को
नाख़ून से हटाएंगे,
नमूने ले जाएंगे।
इसका ग्रुप 'ओ'
इसका 'बी'
और उसका 'बी प्लस' बताएंगे।
लेकिन ये बताना
क्या उनके बस का है,
कि कौन-सा ख़ून किसका है!
क़ौम की पहचान बताने वाला
जाति की पहचान बताने वाला
कोई माइक्रोस्कोप है?
वे नहीं बता सकते
लेकिन मुझे आप से होप है।
बताइए, बताइए,
और एक कवि का
पारिश्रमिक ले जाइए।
अब मैं इन परखनलियों को
स्टोव पर रखता हूं
उबाल आएगा,
ख़ून खौलेगा
बबाल आएगा।
हां, भाईजान
नीचे से गर्मी दो न
तो ख़ून खौलता है
किसी का ख़ून सूखता है
किसी का जलता है
किसी का ख़ून थम जाता है,
किसी का ख़ून जम जाता है।
अगर ये टैस्ट-ट्यूब
फ्रिज में रखूं
ख़ून जम जाएगा,
सींक डालकर निकालूं
तो आइस्क्रीम का मज़ा आएगा।
आप खाएंगे ये आइस्क्रीम?
आप खाएंगे,
आप खाएंगी बहन जी
भाईसाहब आप खाएंगे?
मुझे मालूम है कि
आप नहीं खा सकते
क्योंकि इंसान हैं,
लेकिन हमारे मुल्क़ में
कुछ मज़हबी हैवान हैं।
साम्प्रदायिक दरिन्दे हैं,
जिनके बस ख़ून के ही धंधे हैं।
वो खाते हैं ये आइस्क्रीम
मज़े से खाते हैं,
भाईसाहब बड़े मज़े से खाते हैं,
और अपनी हवस के लिए
आदमी-से-आदमी को लड़ाते हैं।
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है,
इन्हें मीठी लोरियों का
सुर नहीं भाता है।
मांग के सिन्दूर से
इन्हें कोई मतलब नहीं
कलाई की चूड़ियों से
इनका नहीं नाता है।
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
इनके अंदर
धर्म की मांद से निकला
स्वार्थों का
ख़ूंख़ार भेड़िया ग़ुर्राता है,
क़ौमी कोबरा
जीभ लपलपाता है,
अच्छे भले लोगों में
ज़हर फैलाता है।
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
अरे गुरु सबका
गॉड सबका
ख़ुदा सबका
और सबका विधाता है,
लेकिन इन्हें तो
अलगाव ही सुहाता है,
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
मन्दिर के आगे
टूटी हुई चप्पलें
मस्जिद के आगे
बच्चों के बस्ते
गुरु के द्वार पर
बम और गोले,
कोई इन्हें क्या बोले?
इनके सामने
शासन भी सिर झुकाता है,
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
हां तो भाईसाहब!
कोई धोती पहनता है
कोई पायजामा
किसी के पास पतलून है,
लेकिन हर किसी के अंदर
वही ख़ून है।
साड़ी में मां जी
सलवार में बहन जी
बुर्क़े में ख़ातून है,
सबके अन्दर वही ख़ून है,
तो वयों अलग विधेयक हैं
क्यों अलग क़ानून है?
ख़ैर छोड़िए
आप तो ख़ून का फ़र्क़ बताइए,
अंतर क्या है
अपना तर्क बताइए।
क्या पहला पीला
दूसरा हरा
तीसरा नीला है
जिससे पूछो यही कहता है
कि सबके अंदर
वही लाल रंग बहता है।
और यही इस तमाशे की टेक है,
कि रगों में रहता हो
या सड़कों पर बहता हो
लहू का रंग एक है।
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है
कि अलग-अलग
टैस्ट-ट्यूबों में है,
अंतर ख़ून में नहीं है
मज़हबी मंसूबों में है।
और अब मैं जाता हूं,
लेकिन वही पुरानी बात
दोहराता हूं,
कि लहू का रंग
जब एक है- लाल है
तो एक मां के
लालों की तरह रहें,
वक़्त के आवारा बहाव में न बहें।
मज़हब जात, बिरादरी
और ख़ानदान भूल जाएं
ख़ूनदान पहचानें
कि किस ख़ूनदान के हैं,
इंसान के हैं कि हैवान के हैं?
और इस तमाशे वाले की
अंतिम इच्छा यही है कि
ख़ून सड़कों पर न बहे,
वह तो धमनियों में दौड़े
और रगों में रहे।
ख़ून सड़कों पर न बहे
ख़ून सड़कों पर न बहे
ख़ून सड़कों पर न बहे।

Thursday, October 22, 2015

रावण हमें जलाना है

फिर से राम हुए बनवासी,
छायी सब पर आज उदासी
लक्ष्मण के पांवों में छाले,
फिर से समय-चक्र ने डाले।
रावण करता है मनमानी,
छलता सीता को अज्ञानी
हर रावण के अब विरोध में
हमको शोर उठाना है,
रावण हमें जलाना है।

कोई सोये यहां टाट पर,
कोई मखमल और खाट पर।
कोई खाता बालूशाही,
भूख मचाती कहीं तबाही|
कहीं मनाते लोग दीवाली,
कहीं बसी हैं रातें काली|
कैसे भी हो, भेदभाव यह
अब तो हमें मिटाना है,
रावण हमें जलाना है।

Monday, September 21, 2015

सीख लिया

मुर्दों की दुनिया में चलना सीख लिया 
ठोकर खाई और संभालना सीख लिया 
अब जब लोग मुखौटा टाँगे फिरते हैं 
हमने भी छलियों को छलना सीख लिया

Tuesday, September 1, 2015

महँगाई

सियासत की बिसात पर वादों की सौगात 
ऐ सी कक्ष में हो रही , महँगाई ..की .बात
भूखी जनता क्या करे, किसे सुनाये पीर 

बातों से .पेट .न. भरे., नैन.. बहायें ..नीर

Tuesday, August 25, 2015

इतिहास का पेपर

इतिहास का पेपर था उस दिन ,
चिंता से ह्रदय धडकता था
थे बुरे शकुन घर से चलते ही ,
बायाँ हाथ फड़कता था
मैंने सवाल जो याद किये ,
वे केवल आधे याद हुए
उनमें से भी कुछ स्कूल तलक ,
आते आते बर्बाद हुए
तुम बीस मिनट हो चुके हो लेट ,
द्वार पर चपरासी नें बतलाया
मैं मेल ट्रेन की तरह दौड़ता ,
कमरे के भीतर आया
परचा हाथों में पकड़ लिया ,
आखें मूंदी तब झूम गया
पढ़ते ही छाया अन्धकार ,
चक्कर आया सर घूम गया
यह सौ नंबर का परचा है ,
मुझको दो की भी आस नहीं
चाहे सारी दुनिया पलटे ,
पर मैं हो सकता पास नहीं
ओ प्रश्नपत्र लिखने वाले ,
क्या मुह लेकर उत्तर दें हम
तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी ,
ये परचा है या Atom Bomb
तूने पूछे वही सवाल ,
जो जो मैंने थे रटे नहीं
जिन हाथों नें ये प्रश्न लिखे ,
वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं
फिर आँख मूंदकर बैठ गया ,
बोला भगवान् दया कर दे
मेरे दिमाग में इन प्रश्नों के उत्तर
ठूस ठूस भर दे
मेरा भविष्य है खतरे में ,
मैं झूल रहा हूँ आयें बायें
तुम करते हो भगवान् सदा ,
संकट में भक्तों की सहाय
जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया
तुमने ही उसे बचाया था
जब दुपद -सुता की लाज लुटी ,
तुमने ही चीर बढ़ाया था
द्रौपदी समझ करके मुझको ,
मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम
मैं विष खाकर मर जाऊँगा ,
वर्ना जल्दी आ जाओ तुम
आकाश चीर कर अम्बर से ,
आई गहरी आवाज़ एक,
रे मुरख ! व्यर्थ क्यूँ रोता है ,
तू आँख खोलकर इधर देख
गीता कहती है करम करो ,
फल की चिंता मत किया करो
मन में आये जो बात उसी को ,
पर्चे में लिख दिया करो
मेरे अंतर के पात खुले ,
पर्चे पर कलम चली चंचल
ज्यों किसी खेत की छाती पर ,
चलता हो हलवाहे का हल
मैंने लिखा पानीपत का दूसरा युद्ध,
हुआ सावन के मौसम में
Japan Germani बीच हुआ ,
अठारह सौ सत्तावन में
लिख दिया महात्मा बुध ,
महात्मा गाँधी के चेले थे
गाँधी जी के संग बचपन में वो
आँख मिचौली खेले थे
राणा प्रताप नें गौरी को ,
केवल दस बार हराया था
अकबर नें हिंद महा सागर ,
अमरीका से मंगवाया था
महमूद गजनबी उठते ही ,
दो घंटे रोज़ नाचता था
औरंगजेब रंग में आकर ,
औरों की जेब काटता था
इस तरह अनेकों भावों से ,
फूटे भीतर के फव्व्वारे
जो जो सवाल थे याद नहीं ,
वे ही पर्चे पर लिख मारे
हो गया परीक्षक पागल सा ,
मेरी copy को देख देख
बोला इन सब छात्रों में ,
बस होनहार है यही एक
औरों के पर्चे फेंक दिए ,
मेरे सब उत्तर छांट लिए
Zero नंबर देकर
बाकी के सारे नंबर काट लिए ….

Wednesday, August 5, 2015

वक़्त

है सर पे खड़ा ख़ून मेरा चाटने को वक़्त
कोई भी नहीं पास मेरे बाँटने को वक़्त ।
तू था तो वक़्त काट लिया दौड़-दौड़ कर
अब तू नहीं तो दौड़ता है काटने को वक़्त ।।

Sunday, August 2, 2015

प्यार

फ़रिश्ता या ख़ुदा होने से मैं इंकार करता हूँ 
बशर अदना सा हूँ एहसास का व्यापार करता हूँ ।
सितारे क्या, नहीं मैं तोड़ पाऊंगा खिलौना तक
बिना दावों बिना कसमों के तुमसे प्यार करता हूँ ।।

Thursday, June 18, 2015

मेरे मुल्क के मालिकों

मेरे मुल्क के मालिकों
आपने यह देश की क्या हालत बना दी
गुलामी ने तो लुटिया डुबाई थी
आपने तो लुटिया ही गुमा दी
भ्रष्टाचार के सारे तार आपसे जुड़ गये
ट्यूबलाइट आपका जला
और फ्यूज हमारे उड़ गये
ऐसी देशभक्ति सबको फले
कटोरा लेकर आये थे
और सूटकेस भरके चले
अब देश पराया
और आप कुर्सी के सगे हो गये
हरियाली दिखी तो आदमी से गधे हो गये
भूख ने यहां तक तुमको तोड़ा
कि पशुओं का चारा तक नहीं छोड़ा
आप ही ने तो कहा था हुजूर
हम जब सत्ता में आयेंगे
एक-एक भ्रष्टाचारी को
बिजली के खम्भे से लटकायेंगे
आप तो उनसे भी बड़ा झांसा दे गये
लटकाना तो दूर
आप तो खम्भा ही उखाड़कर ले गये
मेरे मुल्क के मालिकों जवाब दो
पिछले पचास सालों का हिसाब दो
मुक्ति का बिरवा क्यों ऐसा खिला
कि बुढ़ापे को लकड़ी और
बचपन को खिलौना नहीं मिला
पूरी एक पीढ़ी
अभावों में पैदा हुई और अभावों में ही मर गयी
सर तो आपके सजदे में था
फिर उसकी लाश किधर गयी ?
आपको क्या मालूम
धरती पर कहां गरीबी की रेखा है
आपने तो हमेशा आसमान से भारत को देखा है
धन्य हो बाबा अम्बेडकर आप
अच्छा संविधान बनाया गरीबों के बाप
चपरासी के लिए एम. ए.
और मंत्री के लिए अंगूठा छाप
प्रतिभावान दर-दर की ठोकरें खायें
और संविधान के कातिल देश चलायें
कोना-कोना अपराधियों से भर गया है
शास्त्री जी क्या मरे
पूरे देश का सपना मर गया है
मगर आप वक्त की आवाज कब सुनते हैं
वो तो हमीं नालायक हैं जो आपको चुनते हैं
हमारा जीना भी देश के लिए भार
और आपका मरना भी जैसे त्यौहार
वो मातम क्या जिसमें व्हिस्की या रम नहीं होती
आपकी तो अर्थी भी किसी शादी से कम नहीं होती
आप तो मरकर भी स्टेच्यू बनकर जिए जाते हैं
हमें तो कंधे भी किराए से दिए जाते हैं
भरे पेटों
भूखे पेटों को आश्वासनों की बोलियां
और अपने लिए हाजमे की गोलियां
फिर भी वजन कम नहीं होता
हैरत तो इस बात पर होती है यार
जिनने देश हजम कर लिया
उनसे खाना हजम नहीं होता !
माफ करना हुजूर
आपने जिन्हें पकवान समझकर चखे हैं
वो पकवान नहीं
आपकी थाली में हम रखे हैं
नमकहराम मालिकों
जिस जनता ने आपको चुना
आपने उसी को गोलियों से धुना
और अब उसी जनता के भय से चाहिए
आपको जेड श्रेणी की सुरक्षा
हमारे ही नेता और हमसे ही रक्षा
अच्छा !
हमारी कौन करेगा रक्षा ?
हम मरे तो आपके लिए समस्या खड़ी हो गई
आपकी सुरक्षा देश से बड़ी हो गई
आगे-पीछे चार-चार कमांडो
सांडो
कार से जरा नीचे तो उतरो
पांव में छाले नहीं पड़ जायेंगे
हमारी मिटटी का मन काला नहीं है
जो आप काले पड़ जायेंगे
राम-राज्य के धोबियों
सत्ता के लोभियों
आप हमारा मुंह न खुलवायें
सीमा पर सीस हम कटवायें
और सूरमा भोपाली आप कहलायें
तोप और बन्दूक को तो फेंको
मुंह की मक्खी ही उड़ा कर देखो-
कायरता जिस चेहरे का श्रृंगार करती है
उस पर मक्खी तक बैठने से इंकार करती है
माफ करना हुजूर
यह देश की सरहद है
आपके बंगले का बैडरूम नहीं
जहां रोज नई-नई बुलबुलें चहकती हैं
सरहदें खुशबू से नहीं, खून से महकती हैं
और मत दो हमें आश्वासनों के झूले
हम शहीद हुए तो हमारा नाम तक भूले
दीये हमारे घरों के बुझे
और इतिहास में पांव आपके पुजे
और तो और लहू से हम नहाये
और होली खेलते हुए आपके फोटो आये
अब तो अखबार आते ही ब्लडप्रेशर बढ़ता है
सुबह-सुबह आपकी सूरत देखना पड़ता है
टी. वी. आपके दम पर टिका है
इतिहास हमेशा झूठों ने लिखा है
कहां तक भोगें इस दोगलेपन का शाप
खिलें हम और महकें आप
जबान खुश्क है, कौन इस बेशर्मी पर थूके
बलिदान का सौदा करने से भी नहीं चूके
जिसने देश की रग-रग में बारूद भरदी
उसी को जीती हुई जमीन वापस करदी
अब सीमा पर हम नहीं आप मरेंगे
या वो कागज नहीं बनेगा
जिस पर आप दस्तखत करेंगे
हुजूर आपके इतने अहसान क्या कम हैं
असली गुनहगार तो हम हैं
हमीं अगर मौसम का रुख देखकर फसल बोते
तो हम भिंडी और आप टमाटर नहीं होते
क्या जलवा है हुजूर आपका
प्रजातंत्र आपका चपरासी है
संसद आपकी दासी है
किसमें हिम्मत है जो आपके गरेबान पर हाथ डाले
किए जाओ घोटाले पर घोटाले
दिये जाओ कानून को धोखे पर धोखे
लगाए जाओ भ्रष्टाचार के चौके पर चौके
अंपायर अपना है
ऐसा अवसर मत खोना
जब तक एक भी दर्शक जिन्दा है
आप आउट मत होना
देश आपके अब्बा की जागीर है, खाओ
मगर एक बात तो बताओ
उस दिन दुनिया का कौनसा वकील लाओगे
जब अपराधियों के कटघरे में हम नहीं
तुम नजर आओगे
तब याद आयेंगे गुलजारीलाल नन्दा
जब पड़ेगा गले में फांसी का फंदा
तब समझोगे देशद्रोहियो !
देशभक्त क्यों मरकर अमर होता है
भगत सिंह और तुम्हारे फंदे में क्या अंतर होता है
हम आजादी का जश्न उसी दिन मनायेंगे
जब आप लालकिले पर नहीं
हमारे दिलों पे झंडा फहरायेंगे

Wednesday, June 17, 2015

खामिया तलाश करता हू.

गुज़रते लम्हों में सदिया तलाश करता हूँ,
ये मेरी प्यास है नदिया तलाश करता हूँ !
यहाँ तो लोग गिनाते है खुबिया अपनी,
में अपने आप में खामिया तलाश करता हू.!! - अनजान

Wednesday, May 6, 2015

सफीना मिले

दौलत मिले शोहरत मिले, नग या नगीना मिले
जितना भी मिले मुझे, बस बहाकर पसीना मिले
समंदर में लहरें उठेंगी, शोर भी होगा तूफ़ान का
साहिल पर पहुंचा दे, ऐसा एक सफीना मिले

Monday, March 9, 2015

दिखावा

सच मानो तो.. महज दिखावा है 
सम्मान नारी ..का एक छलावा है 
आदमी तो आदमी इंसान भेड़िया है 
माँ बहन बेटियों को यही पछतावा है

Tuesday, March 3, 2015

जिंदगी को अभी .नए मुकाम देने है

कोशिशों को ....अभी अंजाम देने हैं 
मुश्किलों को अभी कुछ.नाम देने हैं 
माना की काटों ....भरी है ये जिंदगी 
जिंदगी को अभी .नए मुकाम देने है

Sunday, February 1, 2015

अँधेरे में समाना चाहता हूँ

मैं अब सब कुछ भुलाना चाहता हूँ 
कहीं बस दूर जाना चाहता हूँ 
उजालों , छोड़ दो दामन मेरा 
अँधेरे में समाना चाहता हूँ ।।

Tuesday, January 20, 2015

अंगार बन जाते हैं

प्यार की हो बात तो हम सिंगार बन जाते हैं 
दुश्मनी के खेल में हम तलवार बन जाते हैं 
जान देकर भी निभाते हैं सभी से हम दोस्ती 
हो अमन खतरे में तो हम अंगार बन जाते हैं

Monday, January 5, 2015

चमचा

जिसको पैसा मिला वो सब ऐय्याश हो गए 
जो जीवन में फेल हुए वो राजनीति में पास हो गए ,
ये चमचागिरी का जमाना है आजमाओ आनंद 
कुछ मंत्री हुए कुछ मंत्री के खास हो गए