Wednesday, October 9, 2013

इधर देखिए

राहजन बन गया रहगुजर देखिए॰
है ये कैसा अनोखा सफर देखिए .....
देखती कुछ नहीं कुर्सियों के सिवा 
इस सियासत की गहरी नज़र देखिए ....
क्या है अच्छा बुरा जानते कुछ नहीं 
कैसे सच से हुए बेखबर देखिए .......
वक्त के आइना की ज़िन्दगी है मेरी
इक नज़र आप भी तो इधर देखिए ॰

Monday, September 30, 2013

अहिंसावादी

बात बहुत छोटी थी श्रीमान्
विज्ञापन था-
पहलवान छाप बीड़ी
और हमारे मुँह से निकल गया
बीड़ी छाप पहलवान।
बस, हमारे पहलवान पड़ोसी
ताव खा गए
ताल ठोककर मैदान में आ गए
एक झापड़ हमारे गाल पर लगाया
हमें गुस्से की बजाय
महात्मा गांधी का ख्याल आया
हमने दूसरा गाल
पहलवान के सामने पेश कर दिया
मगर वो शायद
नाथूराम गोडसे का भक्त था
उसने दूसरे गाल पर भी धर दिया
फिर मुस्कुरा कर बोला-
एकाध और खाओगे?
लेकिन ये तो बताओ बेटा
तीसरा गाल कहाँ से लाओगे?
हमने कहा-
पहलवान जी
आपकी इस अप्रत्याशित
कार्यवाही ने
हमें बड़े संकट में डाल दिया है
गांधी जी ने ये तो कहा था
कि कोई एक गाल पर मारे
तो दूसरा लेकर आगे बढ़ना,
परन्तु जल्दबाज़ी में
वो ये बताना भूल गए
कि तुम जैसा कोई
पहलवान पल्ले पड़ जाए
तो क्या करना!
इसलिए हे पहलवान जी!
आप ज़रा पाँच मिनिट यहीं ठहरना
मैं अभी उनकी
आत्मकथा पूरी पढ़कर आता हूँ
शायद उसमें आगे कुछ लिखा हो।
कहकर हम
पी टी ऊषा की गति से
घर में घुसे
पहलवान के साथ-साथ
सारे मुहल्लेवाले
हमारी दुर्दशा पर हँसे
लेकिन ठीक पंद्रह मिनिट बाद
जब हम अपने घर से बाहर निकले
तो हमारे बाएँ हाथ में मूँछ
और दाएँ हाथ में रिवॉल्वर था
रिवाल्वर का निशाना
पहलवान की छाती पर था
रिवाल्वर देखते ही
पहलवान हकलाने लगे
बोले- ये…ये…क्या
त…त…तुम….तो
म…म…महात्मा गांधी के
भ…भ…भक्त हो!
हमने कहा- हूँ नहीं, था!
लेकिन अभी-अभी
पन्द्रह मिनिट पहले
मैंने उनकी पार्टी से इस्तीफ़ा देकर
चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी
ज्वाइन कर ली है
पूरी रिवाल्वर गोलियों से भर ली है
अब बोलो बेटा पहलवान
पहलवान छाप बीड़ी
या बीड़ी छाप पहलवान?
पहलवान बोले- हें…हें…हें…
जैसा आप ठीक समझें श्रीमान्!
हमने कहा-
श्रीमान् के बच्चे
साले, गुंडे, लफंगे, लुच्चे
अहिंसावादियों को डराता है!
महात्मा गांधी के भक्तों का
मज़ाक उड़ाता है!
ख़बरदार, आगे से पहलवानी दिखाई
तो हाथ-पैर तोड़कर
अखाड़े में डाल दूंगा,
इसी रिवाल्वर से
खोपड़ी का गूदा निकाल दूंगा।
मुहल्ले वालो!
आगे से क़सम खा लो
आज से कोई
इस पिद्दी पहलवान की
दादागीरी नहीं सहेगा
इस देश में
अगर अहिंसावादी नहीं रह पाया
तो कोई आतंकवादी भी नहीं रहेगा!

Monday, September 23, 2013

हैं आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए

देखो कैसे डालर मुंह फाड़े खड़ा है 
कहने को तो अपना रुपया सबसे बड़ा है 
पैसे जो कमाते घर खर्च मुश्किल से खिचता है 
रुपये वाले देश में सामान डालर के भाव बिकता है 
कहता वो १२ में खाना पर कंहा वो होटल है 
अरे भाई २० की तो यंहा पानी की बोटल है 

बद से बदतर और बदनाम हो गए 
है आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए 

किन किन चीजो  में हमने नहीं किया घोटाला 
कभी चारे में सने हाथ कभी कोयले से मुंह काला 
कभी घोटालें तोपों की घोटालों के हेलीकाप्टर उड़ायें हैं 
देश को बेच दिया ताबूतों में भी हमने पैसे खाएं हैं 
कर दें किसी में भी घोटाला घोटालों के सरताज हैं हम 
बिमारी खाने की बड़ चुकी अब लाईलाज हैं हम 

हमारी वज़ह से गाँव शहर शमशान हो गए 
है आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए 

किसी को याद नहीं की कैसे मिली आज़ादी 
आज सबसे ज्यादा बदनाम है खादी 
सिर्फ और सिर्फ पैसे खाने राजनीति मैं आये हैं 
बनते ही कुछ,  कमाई के नए नए तरीके अपनाए हैं 
देश की नहीं सबको कुर्सी की चिंता सताती है 
और बैठते ही कुर्सी पे जनता को मुंह चिड़ाती है 

किसी नें खिंची नहीं इसलिए बे-लगाम हो गए 
है आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए 

Tuesday, August 6, 2013

जिए जा रहे थे

ज़िन्दगी में दो मिनट कोई मेरे पास न बैठे 
आज सब मेरे पास बैठे जा रहे थे 
कोई तोहफा न मिला आज तक मुझे और आज 
फूल ही फूल दिए जा रहे थे 
तरस गया मै किसी के हाथ से दिए एक कपडे को 
और आज नए नए कपडे ओढ़ाये जा रहे थे 
दो कदम साथ न  चलने को तैय्यार था कोई 
और आज काफिला बनाकर चले जा रहे थे 
आज पता चल मौत इतनी हसीं होती है 
कम्बक्त हम तो यूँही जिए जा रहे थे ....

Thursday, July 25, 2013

सिर्फ़ हाथ का क्या करेगा?

डरते झिझकते
सहमते सकुचाते
हम अपने होने वाले
ससुर जी के पास आए,
बहुत कुछ कहना चाहते थे
पर कुछ
बोल ही नहीं पाए।

वे धीरज बँधाते हुए बोले-
बोलो!
अरे, मुँह तो खोलो।

हमने कहा-
जी. . . जी
जी ऐसा है
वे बोले-
कैसा है?

हमने कहा-
जी. . .जी ह़म
हम आपकी लड़की का
हाथ माँगने आए हैं।

वे बोले
अच्छा!
हाथ माँगने आए हैं!
मुझे उम्मीद नहीं थी
कि तू ऐसा कहेगा,
अरे मूरख!
माँगना ही था
तो पूरी लड़की माँगता
सिर्फ़ हाथ का क्या करेगा?

Monday, July 22, 2013

तुम भी झूठे हो

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो,
मेरी तरह तुम भी झूठे हो 

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।

अजीब शख्स है नाराज होके हंसता है,
मैं चाहता हूं ख़फ़ा हो,तो ख़फ़ा ही लगे।

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा,
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा।

एक दिन तुझ से मिलने जरूर आऊंगा
जिंदगी मुझ को तेरा पता चाहिए।

पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,
आंखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते।

देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अंदाज से,
सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं।

मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं,
हाय मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं।

हम अभी तक हैं गिरफ्तार ए मुहब्बत यारों,
ठोकरें खा के सुना था कि सम्भल जाते हैं।

Thursday, July 11, 2013

हाशिम फिरोजाबदी

मोहोब्बत का घना बादल बना देता तो अच्छा था
मुझे उस आँख का काजल बना देता तो अच्चा था 
उसे पाने की खाहिश अब मुझे जीने नहीं देती 
खुदाया तू मुझे पागल बना देता तो अच्चा था - हाशिम फिरोजाबदी

Monday, June 17, 2013

चल गयी

वैसे तो एक शरीफ इंसान हूं
आप ही की तरह श्रीमान हूं
मगर अपनी आंख से
बहुत परेशान हूं
अपने आप चलती है
लोग समझते हैं-
चलाई गई है
जानबूझ कर मिलाई गई है।
एक बार बचपन में
शायद सन पचपन में
क्लास में
एक लड़की बैठी थी पास में
नाम था सुरेखा
उसने हमें देखा
और आंख बाईं चल गई
लड़की हाय हाय करती
क्लास छोड़ बाहर निकल गई।
थोड़ी देर बाद
हमें है याद
प्रिंसिपल ने बुलाया
लंबा-चौड़ा लैक्चर पिलाया
हमने कहा कि जी भूल हो गई
वो बोला- ऐसा भी होता है भूल में
शर्म नहीं आती
ऐसी गंदी हरकतें करते हो स्कूल में?
और इससे पहले कि हकीकत बयान करते
कि फिर चल गई।
प्रिंसिपल को खल गई।
हुआ यह परिणाम
कट गया नाम
बमुश्किल तमाम
मिला एक काम।
इंटरव्यू में
खड़े थे क्यू में
एक लड़की थी सामने अड़ी
अचानक मुड़ी
नज़र उसकी हम पर पड़ी
और आंख चल गई
लड़की उछल गई
दूसरे उम्मीदवार चौंके
उस लड़की की साइड लेकर हम पर भौंके
फिर क्या था
मार-मार जूते-चप्पल
फोड़ दिया बक्कल
सिर पर पांव रखकर भागे
लोग-बाग पीछे, हम आगे
घबराहट में घुस गए एक घर में
भयंकर पीड़ा थी सिर में
बुरी तरह हांफ रहे थे
मारे डर के कांप रहे थे
तभी पूछा उस गृहिणी ने….
कौन?
हम खड़े रहे मौन
वो बोली- बताते हो या किसी को बुलाऊँ?
और उससे पहले कि जबान हिलाऊँ
चल गई
वह मारे गुस्से के जल गई
साक्षात् दुर्गा सी दीखी
बुरी तरह चीखी
बात की बात में
जुड़ गए अड़ोसी-पड़ोसी
मौसा-मौसी
भतीजे-मामा
मच गया हंगामा
चड्डी बना दिया हमारा पाजामा
बनियान बन गया कुर्ता
मार-मार बना दिया भुरता
हम चीखते रहे
और पीटने वाले हमें पीटते रहे
भगवान जाने कब तक निकालते रहे रोष
और जब आया हमें होश
तो देखा अस्पताल में पड़े थे
डॉक्टर और नर्स घेरे खड़े थे
हमने अपनी एक आंख खोली
तो एक नर्स बोली-
दर्द कहां है?
हम कहां-कहां बताते
और इससे पहले कि कुछ कह पाते
चल गई
नर्स कुछ नहीं बोली बाई गॉड!
मगर डॉक्टर को खल गई
बोला- इतने सीरियस हो
फिर भी ऐसी हरकत कर लेते हो इस हाल में
शर्म नहीं आती
मुहब्बत करते हुए अस्पताल में?
उन सबके जाते ही आया वार्ड-ब्वाय
देने लगा अपनी राय
भाग जाएं चुपचाप
नहीं जानते आप
बात बढ़ गई है
डॉक्टर को गढ़ गई है
केस आपका बिगड़वा देगा
न हुआ तो मरा बताकर
जिन्दा ही गड़वा देगा।
तब अंधेरे में आंख मूंदकर
खिड़की से कूदकर भाग आए
जान बची तो लाखों पाए।
एक दिन सकारे
बाप जी हमारे
बोले हमसे-
अब क्या कहें तुमसे?
कुछ नहीं कर सकते तो शादी ही कर लो
लड़की देख लो
मैंने देख ली है
जरा हैल्थ की कच्ची है
बच्ची है, फिर भी अच्छी है
जैसे भी, आखिर लड़की है
बड़े घर की है,
फिर बेटा
यहां भी तो कड़की है।
हमने कहा-
जी अभी क्या जल्दी है?
वे बोले-
गधे हो
ढाई मन के हो गए
मगर बाप के सीने पर लदे हो
वह घर फंस गया तो संभल जाओगे।
खोटे सिक्के हो, मगर चल जाओगे।
तब एक दिन भगवान से मिल के
धड़कते दिल से
पहुंच गए रुड़की, देखने लड़की
शायद हमारी होने वाली सास
बैठी थीं हमारे पास
बोलीं-
यात्रा में तकलीफ तो नहीं हुई
और आंख मुई
चल गई
वे समझीं कि मचल गई
बोलीं-
लड़की तो अंदर है
मैं तो लड़की की मां हूं
लड़की को बुलाऊँ
और इससे पहले कि जुबान हिलाऊँ
आंख चल गई दुबारा
उन्होंने किसी का नाम लेकर पुकारा
झटके से खड़ी हो गईं
हमारे पिताजी का पूरा प्लान धो गई।
हम जैसे गए थे, लौट आए
घर पहुंचे मुंह लटकाए
पिताजी बोले-
अब क्या फायदा मुंह लटकाने से
आग लगे ऐसी जवानी में
डूब मरो चुल्लू भर पानी में
नहीं डूब सकते तो आंख फोड़ लो
नहीं फोड़ सकते तो हमसे नाता तोड़ लो
जब भी कहीं जाते हो
पिटकर ही आते हो
भगवान जाने कैसे चलाते हो?
अब आप ही बताइए
क्या करूं
कहां जाऊं
कहां तक गुन गाऊं अपनी इस आंख के
कम्बख्त जूते खिलवाएगी
लाख-दो लाख के
अब आप ही संभालिए
मेरा मतलब है
कोई रास्ता निकालिए
जवान हो या वृध्दा
पूरी हो या अध्दा
केवल एक लड़की
जिसकी एक आंख चलती हो
पता लगाइए
और मिल जाए तो
हमारे आदरणीय काका जी को बताइए।

Sunday, May 5, 2013

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है
जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहाँ आदमी की कहाँ कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था

Friday, March 15, 2013

मूर्खिस्तान जिंदाबाद


स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियो !
माताओ और पिताओ,
आओ, कुछ चमत्कार दिखाओ।
नहीं दिखा सकते ?
तो हमारी हाँ में हाँ ही मिलाओ।

हिंदुस्तान, पाकिस्तान अफगानिस्तान
मिटा देंगे सबका नामो-निशान
बना रहे हैं-नया राष्ट्र ‘मूर्खितान’
आज के बुद्धिवादी राष्ट्रीय मगरमच्छों से
पीड़ित है प्रजातंत्र, भयभीत है गणतंत्र

इनसे सत्ता छीनने के लिए
कामयाब होंगे मूर्खमंत्र-मूर्खयंत्र
कायम करेंगे मूर्खतंत्र।

हमारे मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे-
तानाशाह ढपोलशंख
उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे-
खट्टासिंह, लट्ठासिंह, खाऊलाल, झपट्टासिंह

रक्षामंत्री-मेजर जनरल मच्छरसिंह
राष्ट्रभाषा हिंदी ही रहेगी, लेकिन बोलेंगे अँगरेजी।
अक्षरों की टाँगें ऊपर होंगी, सिर होगा नीचे,
तमाम भाषाएँ दौड़ेंगी, हमारे पीछे-पीछे।

सिख-संप्रदाय में प्रसिद्ध हैं पाँच ‘ककार’-
कड़ा, कृपाण, केश, कंघा, कच्छा।
हमारे होंगे पाँच ‘चकार’-
चाकू, चप्पल, चाबुक, चिमटा और चिलम।

इनको देखते ही भाग जाएँगी सब व्याधियाँ
मूर्खतंत्र-दिवस पर दिल खोलकर लुटाएँगे उपाधियाँ
मूर्खरत्न, मूर्खभूषण, मूर्खश्री और मूर्खानंद।

प्रत्येक राष्ट्र का झंडा है एक, हमारे होंगे दो,
कीजिए नोट-लँगोट एंड पेटीकोट
जो सैनिक हथियार डालकर
जीवित आ जाएगा

उसे ‘परमूर्ख-चक्र’ प्रदान किया जाएगा।
सर्वाधिक बच्चे पैदा करेगा जो जवान
उसे उपाधि दी जाएगी ‘संतान-श्वान’
और सुनिए श्रीमान-

मूर्खिस्तान का राष्ट्रीय पशु होगा गधा,
राष्ट्रीय पक्षी उल्लू या कौआ,
राष्ट्रीय खेल कबड्डी और कनकौआ।

राष्ट्रीय गान मूर्ख-चालीसा,
राजधानी के लिए शिकारपुर, वंडरफुल !
राष्ट्रीय दिवस, होली की आग लगी पड़वा।

प्रशासन में बेईमान को प्रोत्साहन दिया जाएगा,
ईमानदार सुर्त होते हैं, बेईमान चुस्त होते हैं।
वेतन किसी को नहीं मिलेगा,
रिश्वत लीजिए,
सेवा कीजिए !

‘कीलर कांड’ ने रौशन किया था
इंगलैंड का नाम,
करने को ऐसे ही शुभ काम-
खूबसूरत अफसर और अफसराओं को छाँटा जाएगा
अश्लील साहित्य मुफ्त बाँटा जाएगा।

पढ़-लिखकर लड़के सीखते हैं छल-छंद,
डालते हैं डाका,
इसलिए तमाम स्कूल-कालेज
बंद कर दिए जाएँगे ‘काका’।
उन बिल्डिगों में दी जाएगी ‘हिप्पीवाद’ की तालीम

उत्पादन कर से मुक्त होंगे
भंग-चरस-शराब-गंजा-अफीम
जिस कवि की कविताएँ कोई नहीं समझ सकेगा,

उसे पाँच लाख का ‘अज्ञानपीठ-पुरस्कार मिलेगा।
न कोई किसी का दुश्मन होगा न मित्र,
नोटों पर चमकेगा उल्लू का चित्र !

नष्ट कर देंगे- धड़ेबंदी गुटबंदी, ईर्ष्यावाद, निंदावाद। मूर्खिस्तान जिंदाबाद !