Sunday, December 18, 2011

दोस्त


दिल में आरजू के दिए जलते रहेंगे
आँखों से आंसू निकलते रहेंगे
तुम दोस्त बनकर यूँही रौशनी कर दो
हम मोम बनकर यूँही पिघलते रहेंगे

Friday, December 16, 2011

बेटियाँ - शैलेश लोधा


क्या लिखूं ?
की  वो परियों का रूप होती है
या कडकती ठण्ड में सुहानी धूप  होती हैं

वो  होती हैं उदासी के हर मर्ज़ की दावा की तरह
या ओस में शीतल हवा की तरह
वो चिडियों की चेह्चाहट हैं
या के निश्चल खिलखिलाहट है
वोह आँगन में  फैला उजाला हैं
या मेरे गुस्से पे लगा ताला हैं
वो पहाड की चोटी पे सूरज की किरण है
या जिंदगी सही जीने का आचरण  है

है वो ताकत जो छोटे से घर को महल बना दे
हैं वो काफिया जो किसी गज़ल को मुकम्मल कर दे
वो अक्षर जो न हो तो वर्णमाला अधूरी है
वो जो सबसे ज्यादा जरूरी है

ये नहीं कहूँगा की वो हर वक्त साथ साथ होती है
बेटियाँ तो सिर्फ एक एहसास होती है
वो मुझसे ऑस्ट्रेलिया में छुट्टियाँ
५ स्टार में डिन्नर या महंगे iPods नहीं मांगती
न वो धीरे से पैसे पिग्गी बैंक में उडेलना चाहती है
वो बस कुछ देर मेरे साथ खेलना चाहती है
और मैं कहता हूँ यही
की बेटा बहुत काम है... नहीं करूँगा तो कैसे चलेगा
मजबूरी भरे दुनिया दारी के जवाब देने लगता हूँ
और वो झूठा ही सही
मुझे एहसास दिलाती है
की जैसे सबकुछ समझ गयी हो
लेकिन आँखें बंद करके रोती है
जैसे सपने में खेलते हुए मेरे साथ सोती है
जिंदगी न जाने क्यों इतनी उलझ जाती है
और हम समझते हैं की बेटियाँ सब समझ जाती है

Wednesday, December 14, 2011

मोहोब्बत



सफर मोहोब्बत का दुश्वार कितना है
मगर देखना है की वो वफादार कितना है
यही सोच कर उससे कभी माँगा नहीं मैंने
उसे परखना हैं की वो मेरा तलबगार कितना है

Sunday, December 11, 2011

ख्वाब

उसने कहा था ख्वाब में आने का वक्त दो
उनको कौन समझाए की अब नींद का वक्त गुजार गया 

Wednesday, December 7, 2011

सहारा


कौन कहता हैं उम्र भर का सहारा ऐ मेरे दोस्त
लोग तो जनाजे में भी कंधे बदलते रहते हैं 

Tuesday, December 6, 2011

किताबे


किताबों से कभी गुजरो तो यूं किरदार मिलते हैं
गए वक्तों की ड्योढ़ी पर खड़े कुछ यार मिलेंगे
जिसे हम दिल का वीराना समझ छोड आये ते
वाही उजड़े हुए शहरों के कुछ आसार मिलते हैं     - गुलज़ार  

Sunday, December 4, 2011

जिंदगी

मौत मेरी मंजिल है
जिंदगी मेरा सफर है
टूटे न दिल किसी का
हर दिल खुदा का घर है

Thursday, December 1, 2011

बदल जाते हैं

मिल भी जाते हैं तो कतराके  निकल जाते हैं
हाय मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं

हम अभी तक हैं गिरफ्तारे मोहोब्बत में  यारो
ठोकरे खाके सुना था लोग संभल जाते हैं

वो कभी अपनी जफा पर हुए न शर्मिंदा
हम समझते रहे की पत्थर भी पिघल जाते हैं

उम्र भर जिनकी वफाओ पे हमने भरोसा किया
वक्त पड़ने पर वोही लोग बदल जाते हैं