क्यों जग में पुरुष का पर्याय ही दंभ है
क्या ये सत्य नही???
स्त्री संग पुरुष भी सृष्टि का आरंभ है
माना दोंनो की नियति समान नही
स्त्री होना दुष्तर है तो पुरुष होना भी आसान नही..
क्या ये सत्य नही???
स्त्री संग पुरुष भी सृष्टि का आरंभ है
माना दोंनो की नियति समान नही
स्त्री होना दुष्तर है तो पुरुष होना भी आसान नही..
अक्सर पुरुष की कथा व्यथा
अनकही रह जाती है
पुरुष चरित्र और उसकी भूमिका
अभिव्यक्ति नही पाती है
हर रिश्ते हर चरित्र में...
दायित्व पुरुष का विधान है
स्त्री धन्य धन्य है
तो पुरुष भी महान है
अनकही रह जाती है
पुरुष चरित्र और उसकी भूमिका
अभिव्यक्ति नही पाती है
हर रिश्ते हर चरित्र में...
दायित्व पुरुष का विधान है
स्त्री धन्य धन्य है
तो पुरुष भी महान है
पुरुष जब पुत्र रूप में आता है
दायित्व और उम्मीदें साथ लाता है
माँ कहती बुढ़ापे का सहारा है
पिता कहते कुलदीपक हमारा है
दायित्व और उम्मीदें साथ लाता है
माँ कहती बुढ़ापे का सहारा है
पिता कहते कुलदीपक हमारा है
पुरुष जब परिश्रम करने जाता है
जीवन को दुष्तर रूप में पाता है
स्वयं को स्वर्ण सा निखारने
वो हर कसौटी पर बंध जाता है
जीवन को दुष्तर रूप में पाता है
स्वयं को स्वर्ण सा निखारने
वो हर कसौटी पर बंध जाता है
और जब पति का रूप होता है
पुरुष प्रकृति के समीप होता है
मैं और तुम से ""हम"" के सफर में
वो दो हथेलियों का एक नसीब होता है
पुरुष प्रकृति के समीप होता है
मैं और तुम से ""हम"" के सफर में
वो दो हथेलियों का एक नसीब होता है
जब यही पुरुष पिता बन जाता है
बच्चों की सारी उम्मीदे बन जाता है
भूल कर अस्तित्व अपना
उनके ही स्वपनों में ढ़ल जाता है
बच्चों की सारी उम्मीदे बन जाता है
भूल कर अस्तित्व अपना
उनके ही स्वपनों में ढ़ल जाता है
पुरुष चरित्र के कई रूप है
जैसे स्त्री के कई स्वरुप हैं
बहन का बल है, भाई का संबल है
वो तटस्थता से बहता प्रेम अविरल है
पुरुष दायित्वों का मुस्कुराता निर्वहन है
परिवार को छाँव देता वटवृक्ष सा सघन है
जैसे स्त्री के कई स्वरुप हैं
बहन का बल है, भाई का संबल है
वो तटस्थता से बहता प्रेम अविरल है
पुरुष दायित्वों का मुस्कुराता निर्वहन है
परिवार को छाँव देता वटवृक्ष सा सघन है
पुरुष सबल है ,संस्कार है, साहस है ,सक्षम है
रण में अट्टाहस करने वाला
शत्रु को परास्त करने वाला
केवल स्वयं की, भाव अभिव्यक्ति में अक्षम है
रण में अट्टाहस करने वाला
शत्रु को परास्त करने वाला
केवल स्वयं की, भाव अभिव्यक्ति में अक्षम है
लेकिन उसके मौन में भी
प्रेम है ,पीड़ा है ,परेशानी है
स्त्री यदि मुखर गाथा है
तो पुरुष अनकही कहानी है
प्रेम है ,पीड़ा है ,परेशानी है
स्त्री यदि मुखर गाथा है
तो पुरुष अनकही कहानी है