Sunday, January 28, 2018

पुरुष- एक अनकहा चरित्र

क्यों जग में पुरुष का पर्याय ही दंभ है
क्या ये सत्य नही???
स्त्री संग पुरुष भी सृष्टि का आरंभ है
माना दोंनो की नियति समान नही
स्त्री होना दुष्तर है तो पुरुष होना भी आसान नही..
अक्सर पुरुष की कथा व्यथा
अनकही रह जाती है
पुरुष चरित्र और उसकी भूमिका
अभिव्यक्ति नही पाती है
हर रिश्ते हर चरित्र में...
दायित्व पुरुष का विधान है
स्त्री धन्य धन्य है
तो पुरुष भी महान है
पुरुष जब पुत्र रूप में आता है
दायित्व और उम्मीदें साथ लाता है
माँ कहती बुढ़ापे का सहारा है
पिता कहते कुलदीपक हमारा है
पुरुष जब परिश्रम करने जाता है
जीवन को दुष्तर रूप में पाता है
स्वयं को स्वर्ण सा निखारने
वो हर कसौटी पर बंध जाता है
और जब पति का रूप होता है
पुरुष प्रकृति के समीप होता है
मैं और तुम से ""हम"" के सफर में
वो दो हथेलियों का एक नसीब होता है
जब यही पुरुष पिता बन जाता है
बच्चों की सारी उम्मीदे बन जाता है
भूल कर अस्तित्व अपना
उनके ही स्वपनों में ढ़ल जाता है
पुरुष चरित्र के कई रूप है
जैसे स्त्री के कई स्वरुप हैं
बहन का बल है, भाई का संबल है
वो तटस्थता से बहता प्रेम अविरल है
पुरुष दायित्वों का मुस्कुराता निर्वहन है
परिवार को छाँव देता वटवृक्ष सा सघन है
पुरुष सबल है ,संस्कार है, साहस है ,सक्षम है
रण में अट्टाहस करने वाला
शत्रु को परास्त करने वाला
केवल स्वयं की, भाव अभिव्यक्ति में अक्षम है
लेकिन उसके मौन में भी
प्रेम है ,पीड़ा है ,परेशानी है
स्त्री यदि मुखर गाथा है
तो पुरुष अनकही कहानी है

Friday, January 26, 2018

दिल पर मेरे बना तिरंगा

दिल पर मेरे बना तिरंगा, नक्शा हिन्दुस्तान है ।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई, सब इसकी संतान हैं
पुष्पित इन पुष्पों से होता, भारत देश महान है ।

रंग बिरंगे फूल यहाँ पर, धर्मों की शाखाओं पर ।
देशभक्त हैं लोग यहाँ के, नाज हमें माताओं पर ।
उद्धम और भगत सिंह जैसे, हीरों की यहाँ खान है।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।

जब जब भी मेरे देश को, दुश्मन ने ललकारा है ।
तब तब हमने उसको उसके, घर में घुसकर मारा है ।
आसमान में उड़े तिरंगा, हम सबका अभिमान है ।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।

अपनी धुन के पक्के हैं हम, अपनी शान निराली है ।
पर्वत के सीने में भी हमने तो राह बना ली है ।
कठिन राहें हों चाहे जितनी, हमें लगें आसान हैं ।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।

Monday, January 22, 2018

बसंत का आगमन

आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
पुष्पों की महक से, सबको है महका गया ।
तितलियां आई हैं, अब फूलों को चूमने ।
भ्रमर भी लग गये, अब बिना वजह घूमने ।
विहगों का चहकना, सबको है हर्षा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
नर और नारी क्या, अब सभी पर खुमार है ।
बह रही चहुंओर , प्रीत की ही बयार है ।
प्रीत की बयार का , नशा सभी पर छा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
पुष्पों के बोझ से, झुकी हुई हैं डालियाँ ।
दानों से अब सभी, भरी हुई हैं बालियां ।
खुशियों के रंग यह, जीवन में बिखरा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
काश ! यह बसंत तो महके यूं हर रोज ही ।
फिर तो हम सभी की, होगी हरदम मौज ही ।
अधरों पर मुस्कान, यह सबके बिखरा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।

Sunday, January 21, 2018

पत्नी बोले, हिम्मत डोले

न पूछो हाल इस दिल की,
जख्म हम कैसे ढ़ोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,.......
बदन पे उनके हैं गहने,
पुराने शर्ट हम पहने,
पड़े हैं डाँट भी सहने,
गुलाम लगे लोग भी कहने,
हे भगवन ! आ तु धरती पर,
देख आँसू कैसे धोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,.......
मिला है जब राशन का बिल,
हम खुद दर दर भटकते हैं,
सुन सुन के भाषण धड़के दिल,
हम खुद ही सर पटकते हैं,
ये शादी बस भुलावा है,
हम पिंजरे के बस एक तोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,....
सुबह से शाम तक अफसर,
पिलाते डाँट ही अक्सर,
मैं लेटूँ थककर जा बिस्तर,
बुलाती आलसी कहकर,
अब बच्चे बोले सब मिलकर,
क्यूँ बापू आपा खोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,…

Wednesday, January 10, 2018

बन जाती है हिन्दी


अक्षर - अक्षर के मिलने से, शब्दों का संसार बने ।
भाषाओं की दुनिया में, बिन हिन्दी ना काम बने ।
हिन्दी रस में जब हम डूबे, हमने तो यह पाया है ।
शब्दों के महासागर में, खूब नहाती है हिन्दी ।

अँग्रेजी, रूसी, चीनी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी हैं।
भाषारूपी दुनिया में, कितनी ही महारानी हैं ।
सब भाषाओं को जब परखा, हमने तो यह पाया है ।
महारानियों की महफिल में, बस पटरानी है हिन्दी ।

विज्ञान जगत का गूढ रहस्य, हिन्दी में समाया है ।
सम्पूर्ण जगत ने हिन्दी सहित्य, अनुवादित करवाया है ।
पढ़ - पढ़ हिन्दी साहित्य को हमने तो यह पाया है ।
दीप ज्ञान का सदा जलाती, तिमिरनाशिनी है हिन्दी ।

आड़ी-सीधी रेखाओं से, बनते शब्द निराले हैं ।
क, ख, ग, घ के मिलने से, अर्थ बड़े रसवाले हैं ।
लिखकर देखा जब हिन्दी में , हमने तो यह पाया है ।
कुछ भी लिखो यारों तुम तो, बस बन जाती है हिन्दी ।

Sunday, January 7, 2018

समंदर

दिल जीत लूं वो नजर मैं भी रखता हूँ
भीड़ में नजर आओ वो हुनर भी रखता हूँ
वादा किया है मुस्कुराने का वर्ना
इन आँखों में समंदर मैं भी रखता हूँ

Friday, January 5, 2018

नया साल

आज श्रीमति जी और बच्चों का वार्तालाप
मेरे कानों में भी पड़ गया अपने आप,
वो कह रही थी कि तुम्हारे पापा भी
बिल्कुल लड़के लगते थे कभी,
"थे" शब्द सुनके लगा जैसे
आकाश से बिजली तड़तड़ा कर
और गिरी हो मेरे ऊपर आकर।
और हो गया मैं बेहोश
जब थोड़ी देर बाद आया होश,
तो थोड़ा दिमाग लगाया
और मैंने ये पाया,
कि हम हर बार ,,,,,,,,हर साल
स्वागत करते हैं, मनाते हैं, नया साल,
और ये नया साल,, हमे क्या देता हैं
हमे एक साल और ,,,बूढ़ा बना देता है।
बहुत से लोग नही रखते होंगे इतेफाक
कह रहे हैं बूढा होगा तू और तेरा बाप,
हम तो जवान हैं और
ख्यालों से तो पूछिये मत ,,कितने ज्यादा
भले ही मुह में दाँत नही
और चने खाने का ,,रखते हैं इरादा।
युवा रहने की चाहत बात अच्छी है
लेकिन ये बात भी उतनी ही सच्ची है,
कि वक्त सदैव रहता है गतिमान
और इसकी गाड़ी में
सफर करता है हर इंसान।
वर्तमान की मशीन में
भविष्य एक कच्चा माल है
जो बदलता है अतीत के उत्पाद में
जैसे बीता हुआ साल है।
हर किसी को बूढापा आना है
और फिर एक दिन
दुनिया से गोल हो जाना है,
मगर इसमे क्या गम है
ये तो सृष्टि का नियम है।
तो मेरे दोस्तों वर्तमान के
इन पलो को जियो यूँ जी भर के
कि जब जाओ अतीत में
तो आये ये सुनहरी यादे उभर के,
और जब भी ये आपको याद आये
तो आप रह ना सको बिना मुस्कुराये।

Monday, January 1, 2018

कहानी – हर साल की

जनवरी आता है , नयी उम्मीदों को पंख लगाता है,
फरवरी फर्र फर्र न जाने कब बीत जाता है ,
मार्च सुहाना मौसम लेकर आता है,
उम्मीदों को परवाज देते देते पहला तिमाही गुजर जाता है।
अप्रैल में चहुँओर फूल खिल जाते है ,
मई में सूरज देवता आग बरसाते है ,
जून का महीना पसीना पोछने में बीत जाता है,
आधा साल यूँ ही रीत जाता है।
जुलाई में रिमझिम मानसून बरसता है ,
अगस्त में नदी – नालो में उफान होता है ,
सितम्बर नयी अंगड़ाई लाता है ,
साल के नौ महीने बीत गए – धीरे से कहता है।
अक्टूबर में पेड़ो के पत्ते साख से झड़ जाते है ,
नवंबर में त्यौहार शुरू हो जाते है ,
दिसम्बर फिर सर्द हो जाता है ,
एक साल यूँ ही बीत जाता है।
हर साल कुछ दे जाता है ,
हर साल कुछ ले जाता है ,
समय का चक्र है ,
वक्त का पहिया चलता जाता है।