Wednesday, December 10, 2014

लिखता हूँ

मैं तो लफ़्ज़ों से ख्वाब लिखता हूँ
स्याही से आफताब लिखता हूँ
वक़्त कर ले सवाल जितने भी
लहू से मैं जवाब लिखता हूँ
खोल कर पढेंगे आप कल जिसको
ज़िन्दगी की किताब लिखता हूँ
एक एक ईंट मेरी मेहनत की है
पसीने से हिसाब लिखता हूँ
बदलेगा कल मुझे बदलने वाला
चुप से मैं इन्कलाब लिखता हूँ
इतना आसान नहीं इन्हें दबा देना
थोड़ा लिखता हूँ मगर लाजवाब लिखता हूँ

Sunday, November 16, 2014

बिकते आये हम

कभी संभले तो कभी बिखरते नजर आये हम ,
जिंदगी के हर मोड़ पर खुद में सिमटते आये हम !
यूँ तो जमाना कभी खरीद नहीं सकता हमें रहेश ,
मगर प्यार के दो लफ्जो में सदा बिकते आये हम

Sunday, October 12, 2014

कशिश

कशिश कितनी है तेरी सादगी में 
दीवानों की महफ़िल में आके देख 
तड़प देखनी है गर तुझे मेरी
तो ज़रा नज़र चुरा के देख

Wednesday, October 8, 2014

दास्ताँ -ए-ज़िन्दगी

जुबां खामोश आँखों में नमी होगी 
यही बस मेरी दास्ताँ -ए-ज़िन्दगी होगी 
भरने को तो हर ज़ख़्म भर जायेगा 
कैसे भरेगी वो जगह जहा तेरी कमी होगी।

Thursday, September 25, 2014

डर सा लगता है

तनहा जीने की मुझको इतनी आदत हो गयी 
के अब खुद की परछाई पर गुमान सा रहता है 
देख आइना में खुद को दिल सहम उठता है 
तनहा रातों में 
अक्सर खुद की धड़कन सुनकर डर सा लगता है

Wednesday, September 24, 2014

महँगी शराब पीता हूँ

मैं उसकी आँखों से छलकी शराब पीता हूँ
फ़क़ीर हो के भी महँगी शराब पीता हूँ

तुझे देखूँ तो पहचानने में देर लगे
कभी-कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ

मुझे नशे में बहकने कभी नहीं देता
वो जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ

पराये पैसों से अय्याशियाँ नहीं की हैं
मैं जब भी पीता हूँ अपनी शराब पीता हूँ

पुराने चाहने वालों की याद आने लगे
इसीलिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ

Saturday, September 20, 2014

जंग का मैदान

कहीं मंदिरों में बजी घंटियां और मस्जिदों में आज़ान हुयी ,
कहीं बरसते बारूदों में, फिर सुलह की सड़कें सुनसान हुईं ,
वृद्ध हताश,यौवन निराश और बिलखता बचपन बेचारा ;
कैसे सुकून आये दिल को जब दुनियां जंग का मैदान हुयी !

Monday, September 1, 2014

एहसास

एहसास तेरे गम के -निकाले नहीं जाते 
अब दर्द इस दिलसे - सम्भाले नहीं जाते
गम तो बहुत है पहले से- इस दिल में 
अब नये गम इस दिल में -पाले नहीं जाते

Saturday, August 30, 2014

बिखर सा गया हूँ

अपने ख्वाबों में कुछ यूँ रम सा गया हूँ,
टूटे वो हैं, मैं बिखर सा गया हूँ ||
बदकिस्मत हूँ, जोड़ने की मशक्कत में इनको,
ख्वाब भूल, हकीकत में गुम सा गया हूँ ||

Thursday, August 28, 2014

तुमसे मैने सीखा

अँधेरे को रौशन करना तुमसे मैने सीखा है
बंद मुठ्ठी में सुरज रखना तुमसे मैने सीखा है
होने लगे आँसुओ की बरसात कभी जब जीवन में
करके तब संघर्ष खुश रहना तुमसे मैने सीखा है

Saturday, May 24, 2014

हिन्दोस्तान थोड़ी है

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है 
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है 

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में 
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है 

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन 
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है 

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है 
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है 

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है 

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में 
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

Friday, April 25, 2014

समर शेष है

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की बेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?
कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।
फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतरने वाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।
मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।
वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है
पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?
अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में
समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा
समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं
कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे
समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची ज़मीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर
समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है
समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल
तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध

Sunday, March 30, 2014

धार करते मिले

गिले ,शिकवे हज़ार करते मिले ,
प्यार, इजहार ,यार करते मिले ,
पीठ ज्यों ही घुमाई हमने तो 
अपने खंजर में धार करते मिले !

Sunday, March 9, 2014

किनारा मिल जाये

डूबती कश्तियों को किनारा मिल जाये.......
तेरा साथ ऐ ज़िंदगी दोबारा मिल जाये .........

बहुत अकेले से हो गए हैं शहर में आके........
तेरे शहर में अब कोई हमारा मिल जाये …….

Friday, January 10, 2014

कैसे कैसे ज़ज्बात मिले

कैसे कैसे ज़ज्बात मिले |
अपनों से आघात मिले ||

बात अमन की करे जहाँ में |
ऐसी भी कोई जात मिले ||

आया परिंदा ख़ाली हाँथ |
फिर वही हालात मिले ||

बरसी आँखे भूमिपुत्र की |
पतझड़ सी बरसात मिले ||

उजालो की अब चाह नहीं |
जब मिले तब रात मिले ||

सिर झुका तब कहीं जाना|
पत्थर में ज़ज्बात मिले ||

आह ना हो ज़ख्म भी ना हो |
कोई ऐसा भी प्रभात मिले ||

कभी ऐसा भी मंज़र हो,ख़ुदा |
किस्मत को भी मात मिले ||