Monday, September 30, 2013

अहिंसावादी

बात बहुत छोटी थी श्रीमान्
विज्ञापन था-
पहलवान छाप बीड़ी
और हमारे मुँह से निकल गया
बीड़ी छाप पहलवान।
बस, हमारे पहलवान पड़ोसी
ताव खा गए
ताल ठोककर मैदान में आ गए
एक झापड़ हमारे गाल पर लगाया
हमें गुस्से की बजाय
महात्मा गांधी का ख्याल आया
हमने दूसरा गाल
पहलवान के सामने पेश कर दिया
मगर वो शायद
नाथूराम गोडसे का भक्त था
उसने दूसरे गाल पर भी धर दिया
फिर मुस्कुरा कर बोला-
एकाध और खाओगे?
लेकिन ये तो बताओ बेटा
तीसरा गाल कहाँ से लाओगे?
हमने कहा-
पहलवान जी
आपकी इस अप्रत्याशित
कार्यवाही ने
हमें बड़े संकट में डाल दिया है
गांधी जी ने ये तो कहा था
कि कोई एक गाल पर मारे
तो दूसरा लेकर आगे बढ़ना,
परन्तु जल्दबाज़ी में
वो ये बताना भूल गए
कि तुम जैसा कोई
पहलवान पल्ले पड़ जाए
तो क्या करना!
इसलिए हे पहलवान जी!
आप ज़रा पाँच मिनिट यहीं ठहरना
मैं अभी उनकी
आत्मकथा पूरी पढ़कर आता हूँ
शायद उसमें आगे कुछ लिखा हो।
कहकर हम
पी टी ऊषा की गति से
घर में घुसे
पहलवान के साथ-साथ
सारे मुहल्लेवाले
हमारी दुर्दशा पर हँसे
लेकिन ठीक पंद्रह मिनिट बाद
जब हम अपने घर से बाहर निकले
तो हमारे बाएँ हाथ में मूँछ
और दाएँ हाथ में रिवॉल्वर था
रिवाल्वर का निशाना
पहलवान की छाती पर था
रिवाल्वर देखते ही
पहलवान हकलाने लगे
बोले- ये…ये…क्या
त…त…तुम….तो
म…म…महात्मा गांधी के
भ…भ…भक्त हो!
हमने कहा- हूँ नहीं, था!
लेकिन अभी-अभी
पन्द्रह मिनिट पहले
मैंने उनकी पार्टी से इस्तीफ़ा देकर
चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी
ज्वाइन कर ली है
पूरी रिवाल्वर गोलियों से भर ली है
अब बोलो बेटा पहलवान
पहलवान छाप बीड़ी
या बीड़ी छाप पहलवान?
पहलवान बोले- हें…हें…हें…
जैसा आप ठीक समझें श्रीमान्!
हमने कहा-
श्रीमान् के बच्चे
साले, गुंडे, लफंगे, लुच्चे
अहिंसावादियों को डराता है!
महात्मा गांधी के भक्तों का
मज़ाक उड़ाता है!
ख़बरदार, आगे से पहलवानी दिखाई
तो हाथ-पैर तोड़कर
अखाड़े में डाल दूंगा,
इसी रिवाल्वर से
खोपड़ी का गूदा निकाल दूंगा।
मुहल्ले वालो!
आगे से क़सम खा लो
आज से कोई
इस पिद्दी पहलवान की
दादागीरी नहीं सहेगा
इस देश में
अगर अहिंसावादी नहीं रह पाया
तो कोई आतंकवादी भी नहीं रहेगा!

Monday, September 23, 2013

हैं आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए

देखो कैसे डालर मुंह फाड़े खड़ा है 
कहने को तो अपना रुपया सबसे बड़ा है 
पैसे जो कमाते घर खर्च मुश्किल से खिचता है 
रुपये वाले देश में सामान डालर के भाव बिकता है 
कहता वो १२ में खाना पर कंहा वो होटल है 
अरे भाई २० की तो यंहा पानी की बोटल है 

बद से बदतर और बदनाम हो गए 
है आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए 

किन किन चीजो  में हमने नहीं किया घोटाला 
कभी चारे में सने हाथ कभी कोयले से मुंह काला 
कभी घोटालें तोपों की घोटालों के हेलीकाप्टर उड़ायें हैं 
देश को बेच दिया ताबूतों में भी हमने पैसे खाएं हैं 
कर दें किसी में भी घोटाला घोटालों के सरताज हैं हम 
बिमारी खाने की बड़ चुकी अब लाईलाज हैं हम 

हमारी वज़ह से गाँव शहर शमशान हो गए 
है आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए 

किसी को याद नहीं की कैसे मिली आज़ादी 
आज सबसे ज्यादा बदनाम है खादी 
सिर्फ और सिर्फ पैसे खाने राजनीति मैं आये हैं 
बनते ही कुछ,  कमाई के नए नए तरीके अपनाए हैं 
देश की नहीं सबको कुर्सी की चिंता सताती है 
और बैठते ही कुर्सी पे जनता को मुंह चिड़ाती है 

किसी नें खिंची नहीं इसलिए बे-लगाम हो गए 
है आज़ाद फिर भी गुलाम हो गए