Thursday, November 8, 2018

उस रोज़ 'दिवाली' होती है

जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई  में  भी  मेले  हों,
आनंद की आभा होती है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

       जब प्रेम के दीपक जलते हों
       सपने जब सच में बदलते हों,
       मन में हो मधुरता भावों की
       जब लहके फ़सलें चावों की,
       उत्साह की आभा होती है
       उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।

       जब तन-मन-जीवन सज जाएं
       सद्-भाव  के बाजे बज जाएं,
       महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
      मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
      तृप्ति  की  आभा होती  है
   उस रोज़ 'दिवाली' होती है .।               

Friday, October 26, 2018

हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार–क्षार।
डमरू की वह प्रलय–ध्वनि हूँ, जिसमे नचता भीषण संहार।
रणचंडी की अतृप्त प्यास, मै दुर्गा का उन्मत्त हास।
मै यम की प्रलयंकर पुकार, जलते मरघट का धुँआधार।
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूँ मैं।
यदि धधक उठे जल, थल, अंबर, जड चेतन तो कैसा विस्मय?
हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मै अखिल विश्व का गुरु महान्, देता विद्या का अमरदान।
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरा स्वर्णभ मे घहर–घहर, सागर के जल मे छहर–छहर।
इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सोराभ्मय।
हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मैने छाती का लहू पिला, पाले विदेश के क्षुधित लाल।
मुझको मानव में भेद नही, मेरा अन्तस्थल वर विशाल।
जग से ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार।
अपना सब कुछ हूँ लुटा चुका, फिर भी अक्षय है धनागार।
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयों का वह राजमुकुट।
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरीट तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूँ सब को गुलाम?
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम।
गोपाल–राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया?
कब दुनिया को हिन्दू करने घर–घर मे नरसंहार किया?
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी?
भूभाग नहीं, शत–शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।
हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज।
मेरा इसका संबन्ध अमर, मैं व्यक्ति और यह है समाज।
इससे मैने पाया तन–मन, इससे मैने पाया जीवन।
मेरा तो बस कर्तव्य यही, कर दू सब कुछ इसके अर्पण।
मै तो समाज की थाति हूँ, मै तो समाज का हूं सेवक।
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय।
हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

Monday, October 22, 2018

मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम एम. ए. फ़र्स्ट डिवीजन हो, मैं हुआ मैट्रिक फ़ेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।
तुम फौजी अफ़्सर की बेटी, मैं तो किसान का बेटा हूँ ।
तुम रबडी खीर मलाई हो, मैं सत्तू सपरेटा हूँ ।
तुम ए. सी. घर में रहती हो, मैं पेड के नीचे लेटा हूँ ।
तुम नयी मारूती लगती हो, मैं स्कूटर लम्बरेटा हूँ ।
इस कदर अगर हम छुप-छुप कर, आपस मे प्रेम बढायेंगे ।
तो एक रोज़ तेरे डैडी अमरीश पुरी बन जायेंगे ।
सब हड्डी पसली तोड मुझे, भिजवा देंगे वो जेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम अरब देश की घोडी हो, मैं हूँ गदहे की नाल प्रिये ।
तुम दीवली क बोनस हो, मैं भूखों की हडताल प्रिये ।
तुम हीरे जडी तश्तरी हो, मैं एल्मुनिअम का थाल प्रिये ।
तुम चिकेन-सूप बिरयानी हो, मैन कंकड वाली दाल प्रिये ।
तुम हिरन-चौकडी भरती हो, मैं हूँ कछुए की चाल प्रिये ।
तुम चन्दन-वन की लकडी हो, मैं हूँ बबूल की चाल प्रिये ।
मैं पके आम सा लटका हूँ, मत मार मुझे गुलेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं शनि-देव जैसा कुरूप, तुम कोमल कन्चन काया हो ।
मैं तन-से मन-से कांशी राम, तुम महा चन्चला माया हो ।
तुम निर्मल पावन गंगा हो, मैं जलता हुआ पतंगा हूँ ।
तुम राज घाट का शान्ति मार्च, मैं हिन्दू-मुस्लिम दन्गा हूँ ।
तुम हो पूनम का ताजमहल, मैं काली गुफ़ा अजन्ता की ।
तुम हो वरदान विधाता का, मैं गलती हूँ भगवन्ता की ।
तुम जेट विमान की शोभा हो, मैं बस की ठेलम-ठेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम नयी विदेशी मिक्सी हो, मैं पत्थर का सिलबट्टा हूँ ।
तुम ए. के.-४७ जैसी, मैं तो इक देसी कट्टा हूँ ।
तुम चतुर राबडी देवी सी, मैं भोला-भाला लालू हूँ ।
तुम मुक्त शेरनी जंगल की, मैं चिडियाघर का भालू हूँ ।
तुम व्यस्त सोनिया गाँधी सी, मैं वी. पी. सिंह सा खाली हूँ ।
तुम हँसी माधुरी दीक्षित की, मैं पुलिसमैन की गाली हूँ ।
कल जेल अगर हो जाये तो, दिलवा देन तुम बेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं ढाबे के ढाँचे जैसा, तुम पाँच सितारा होटल हो ।
मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम रेड-लेबल की बोतल हो ।
तुम चित्रहार का मधुर गीत, मैं कॄषि-दर्शन की झाडी हूँ ।
तुम विश्व-सुन्दरी सी कमाल, मैं तेलिया छाप कबाडी हूँ ।
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला हूँ चोंगा ।
तुम मछली मानसरोवर की, मैं सागर तट का हूँ घोंघा ।
दस मन्ज़िल से गिर जाउँगा, मत आगे मुझे ढकेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम सत्ता की महरानी हो, मैं विपक्ष की लाचारी हूँ ।
तुम हो ममता-जयललिता सी, मैं क्वारा अटल-बिहारी हूँ ।
तुम तेन्दुलकर का शतक प्रिये, मैं फ़ॉलो-ऑन की पारी हूँ ।
तुम गेट्ज़, मटीज़, कोरोला हो, मैं लेलैन्ड की लॉरी हूँ ।
मुझको रेफ़री ही रहने दो, मत खेलो मुझसे खेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं सोच रहा कि रहे हैं कब से, श्रोता मुझको झेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

Wednesday, October 3, 2018

गांधी चाहिए

फिर चलनी यहाँ तेज आंधी चाहिए
देश के लिए फिर एक गांधी चाहिए
हो रहा है फिर से देश ये ग़ुलाम
आज फिर वतन को आजादी चाहिए
क्यूँ रहे ग़रीब अब देश ये मेरा
देश में अपने हमें सोना चांदी चाहिए
लूट कर ले गए वतन को जो लोग
देश में उनके हमे बर्बादी चाहिए
हाथ से बुनी थी जो गांधी ने कभी
तन पे हमे आज वही खादी चाहिए
ना रहे ग़रीब कोई और ना भूखा
सबके लिए घर बने और रोटी चाहिए
दूर हो मंहगाई और अब मिले सुकून
बक्श दो जरा सी मेहरबानी चाहिए

Sunday, September 30, 2018

किसान

जो देता है खुशहाली जिसके दम से हरियाली
आज वही बर्बाद खड़ा है देखो उसकी बदहाली।
बहुत बुरी हालत है ईश्वर धरती के भगवान् की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की...
ऐसी आंधी चली की घर का तिनका तिनका बिखर गया
आखिर धरती माँ से उसका प्यारा बेटा बिछड़ गया
अखबारो की रद्दी बनकर बिकी कथा बलिदान की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की
इतना सूद चुकाया उसने की अपनी सुध भूल गया
सावन के मौसम में झूला लगा के फाँसी झूल गया।
अमुआ की डाली पर देखो लाश टंगी ईमान की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की.....
एक अरब पच्चीस करोड़ की भूख जो रोज मिटाता है
कह पता नही वो किसी से जब भूखा सो जाता है
फिर सीने पर गोली खाता सरकारी सम्मान की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की
किसी को काले धन की चिंता किसी को भ्रष्टाचार की
मगर लड़ाई कौन लड़ेगा फसलों के हक़दार की
सरे आम बाजार में इज्जत लुट जाती खलिहान की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की
जो अपने कांधे पर देखो खुद हल लेकर चलता है
आज उसी की कठिनाइयों का हल क्यों नही निकलता है।
है जिससे उम्मीद उन्हें बस चिंता है मतदान की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की...
देख कलेजा फट जाता है, आँखों से आंसू बहते
ऐसा न हो कलम रो पड़े सच्चाई कहते कहते
बाली तक गिरवी रक्खी है बेटी के अभिमान की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की...
चीख पड़ी खेतो की माटी तड़प उठी गम से धरती
बिना कफ़न के पगडण्डी से गुजरी जब उसकी अरथी।
और वही विदा हो गया जिसे चिंता थी कन्यादान की
टूटी माला जैसे बिखरी किस्मत आज किसान की।।

Thursday, September 20, 2018

उसे हिन्दूस्तान कहते हैं

जहाँ हिन्दू मिले जहाँ मुसलमान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते हैं,
जहाँ हर मज़हब को एक सा सम्मान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते हैं।

कहदो उससे जाकर,  जहां में,  हमारे मुल्क से अच्छा कोई मुल्क नहीं,
जहाँ गुरुग्रंथ बाईबल गीता और कुरान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते हैं।

जिसने सदियों से संजोऐ रख्खा है,  इन मोतीयों को एकता के धागे में,
जहाँ आँगनों में तुलसी घरों में रहमान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।

हमारा वतन हमको जान से प्यारा है,  यही बस हमारे जीने का सहारा है,
जहाँ मंदिरों में घंटीयाँ और मस्जिदों में अजान,  मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।

हो जाएगी बेकार ये सब कोशिशें तुम्हारी,  हमको आपस में लड़वाने की,
जहाँ एक दूजे के लिए हथेलीयों पर जान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।

आखिर क्यों ना हो ग़ुमान हमको,  खुद पर, अपने हिन्दूस्तानी होने का,
जहाँ भाईचारा जहाँ अमन ओ अमान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।

सिर्फ और सिर्फ वतन परस्ती,  यही हमारा धरम है यही हमारा करम है,
जहाँ दिलों की हर धड़कन में हिन्दूस्तान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते है ।

इस मिट्टी का दाना पानी बनके जिंदगी,  रगों में हमारी दौड़ रहा है
जहाँ हर क़तरा खून का अपने वतन पे कुर्बान मिले,  उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।

Sunday, September 16, 2018

भारतीय रेल

भारतीय रेल की जनरल बोगी
पता नहीं आपने भोगी कि नहीं भोगी
एक बार हम भी कर रहे थे यात्रा
प्लेटफार्म पर देखकर सवारियों की मात्रा
हमारे पसीने छूटने लगे
हम झोला उठाकर घर की ओर फूटने लगे
तभी एक कुली आया
मुस्कुरा कर बोला - 'अन्दर जाओगे ?'
हमने कहा - 'तुम पहुँचाओगे !'
वो बोला - बड़े-बड़े पार्सल पहुँचाए हैं आपको भी पहुँचा दूंगा
मगर रुपये पूरे पचास लूँगा.
हमने कहा - पचास रुपैया ?
वो बोला - हाँ भैया
दो रुपये आपके बाकी सामान के
हमने कहा - सामान नहीं है, अकेले हम हैं
वो बोला - बाबूजी, आप किस सामान से कम हैं !
भीड़ देख रहे हैं, कंधे पर उठाना पड़ेगा,
धक्का देकर अन्दर पहुँचाना पड़ेगा
वैसे तो हमारे लिए बाएँ हाथ का खेल है
मगर आपके लिए दाँया हाथ भी लगाना पड़ेगा
मंजूर हो तो बताओ
हमने कहा - देखा जायेगा, तुम उठाओ
कुली ने बजरंगबली का नारा लगाया
और पूरी ताकत लगाकर हमें जैसे ही उठाया
कि खुद बैठ गया
दूसरी बार कोशिश की तो लेट गया
बोला - बाबूजी पचास रुपये तो कम हैं
हमें क्या मालूम था कि आप आदमी नहीं, बम हैं
भगवान ही आपको उठा सकता है
हम क्या खाकर उठाएंगे
आपको उठाते-उठाते खुद दुनिया से उठ जायेंगे !

तभी गाड़ी ने सीटी दे दी
हम झोला उठाकर भाये
बड़ी मुश्किल से डिब्बे के अन्दर घुस पाए
डिब्बे के अन्दर का दृश्य घमासान था
पूरा डिब्बा अपने आप में हल्दी घाटी का मैदान था
लोग लेटे थे, बैठे थे, खड़े थे
जिनको कहीं जगह नहीं मिली, वो बर्थ के नीचे पड़े थे|

हमने गंजे यात्री से कहा - भाई साहब
थोडी सी जगह हमारे लिए भी बनाइये
वो सिर झुका के बोला - आइये हमारी खोपड़ी पे बैठ जाइये
आप ही के लिए साफ़ की है|
केवल दो रूपए देना, लेकिन फिसल जाओ तो हमसे मत कहना|

तभी एक भरा हुआ बोरा खिड़की के रास्ते चढ़ा
आगे बढा और गंजे के सिर पर गिर पड़ा
गंजा चिल्लाया - किसका बोरा है ?
बोरा फौरन खडा हो गया
और उसमें से एक लड़का निकल कर बोला
बोरा नहीं है बोरे के भीतर बारह साल का छोरा है
अन्दर आने का यही एक तरीका है
हमने आपने माँ-बाप से सीखा है
आप तो एक बोरे में ही घबरा रहे हैं
जरा ठहर तो जाओ अभी गददे में लिपट कर
हमारे बाप जी अन्दर आ रहे हैं
उनको आप कैसे समझायेंगे
हम तो खड़े भी हैं वो तो आपकी गोद में ही लेट जाएँगे|

एक अखंड सोऊ चादर ओढ़ कर सो रहा था
एकदम कुम्भकरण का बाप हो रहा था
हमने जैसे ही उसे हिलाया
उसकी बगल वाला चिल्लाया -
ख़बरदार हाथ मत लगाना वरना पछताओगे
हत्या के जुर्म मैं अन्दर हो जाओगे
हमने पुछा- भाई साहब क्या लफड़ा है ?
वो बोला - बेचारा आठ घंटे से एक टाँग पर खड़ा
और खड़े खड़े इस हालत मैं पहुँच गया कि अब पड़ा है
आपके हाथ लगते ही ऊपर पहुँच जायेगा
इस भीड़ में ज़मानत करने क्या तुम्हारा बाप आयेगा ?

एक नौजवान खिड़की से अन्दर आने लगा
तो पूरे डिब्बा मिल कर उसे बाहर धकियाने लगा
नौजवान बोला - भाइयों, भाइयों
सिर्फ खड़े रहने की जगह चाहिए
एक अन्दर वाला बोला - क्या ?
खड़े रहने की जगह चाहिए तो प्लेटफोर्म पर खड़े हो जाइये
जिंदगी भर खड़े रहिये कोई हटाये तो कहिये
जिसे देखो घुसा चला आ रहा है
रेल का डिब्बा साला जेल हुआ जा रहा है !
इतना सुनते ही एक अपराधी चिल्लाया -
रेल को जेल मत कहो मेरी आत्मा रोती है
यार जेल के अन्दर कम से कम
चलने-फिरने की जगह तो होती है !

एक सज्जन फर्श पर बैठे हुए थे आँखें मूँदे
उनके सर पर अचानक गिरीं पानी की गरम-गरम बूँदें
तो वे सर उठा कर चिल्लाये - कौन है, कौन है
साला पानी गिरा कर मौन है
दिखता नहीं नीचे तुम्हारा बाप बैठा है !
क्षमा करना बड़े भाई पानी नहीं है
हमारा छः महीने का बच्चा लेटा है कृपया माफ़ कर दीजिये
और अपना मुँह भी नीचे कर लीजिये
वरना बच्चे का क्या भरोसा !
क्या मालूम अगली बार उसने आपको क्या परोसा !!

अचानक डिब्बे में बड़ी जोर का हल्ला हुआ
एक सज्जन दहाड़ मार कर चिल्लाये -
पकड़ो-पकड़ो जाने न पाए
हमने पुछा क्या हुआ, क्या हुआ ?
वे बोले - हाय-हाय, मेरा बटुआ किसी ने भीड़ में मार दिया
पूरे तीन सौ रुपये से उतार दिया टिकट भी उसी में था !
कोई बोला - रहने दो यार भूमिका मत बनाओ
टिकट न लिया हो तो हाथ मिलाओ
हमने भी नहीं लिया है गर आप इस तरह चिल्लायेंगे
तो आपके साथ क्या हम नहीं पकड़ लिए जायेंगे?
वे सज्जन रोकर बोले - नहीं भाई साहब
मैं झूठ नहीं बोलता मैं एक टीचर हूँ
कोई बोला - तभी तो झूठ है टीचर के पास और बटुआ ?
इससे अच्छा मजाक इतिहास मैं आज तक नहीं हुआ !
टीचर बोला - कैसा इतिहास मेरा विषय तो भूगोल है
तभी एक विद्यार्थी चिल्लाया - बेटा इसलिए तुम्हारा बटुआ गोल है !

बाहर से आवाज आई - 'गरम समोसे वाला'
अन्दर से फ़ौरन बोले एक लाला - दो हमको भी देना भाई
सुनते ही ललाइन ने डाँट लगायी - बड़े चटोरे हो !
क्या पाँच साल के छोरे हो ?
इतनी गर्मी मैं खाओगे ?
फिर पानी को तो नहीं चिल्लाओगे ?
अभी मुँह में आ रहा है समोसे
तभी डिब्बे में हुआ हल्का उजाला
किसी ने जुमला उछाला ये किसने बीड़ी जलाई है ?
कोई बोला - बीड़ी नहीं है स्वागत करो
डिब्बे में पहली बार बिजली आई है
दूसरा बोला - पंखे कहाँ हैं ?
उत्तर मिला - जहाँ नहीं होने चाहिए वहाँ हैं
पंखों पर आपको क्या आपत्ति है ?
जानते नहीं रेल हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है
कोई राष्ट्रीय चोर हमें घिस्सा दे गया है
संपत्ति में से अपना हिस्सा ले गया है
आपको लेना हो आप भी ले जाओ
मगर जेब में जो बल्ब रख लिए हैं
उनमें से एकाध तो हमको दे जाओ !

अचानक डिब्बे में एक विस्फोट हुआ
हलाकि यह बम नहीं था
मगर किसी बम से कम भी नहीं था
यह हमारा पेट था उसका हमारे लिए संकेत था
कि जाओ बहुत भारी हो रहे हो हलके हो जाओ
हमने सोचा डिब्बे की भीड़ को देखते हुए
बाथरूम कम से कम दो किलोमीटर दूर है
ऐसे में कुछ हो जाये तो किसी का क्या कसूर है
इसिलए रिस्क नहीं लेना चाहिए
अपना पडोसी उठे उससे पहले अपने को चल देना चाहिए
सो हमने भीड़ में रेंगना शुरू किया
पूरे दो घंटे में पहुँच पाए
बाथरूम का दरवाजा खटखटाया तो भीतर से एक सिर बाहर आया
बोला - क्या चाहिए ?
हमने कहा - बाहर तो आजा भैये हमें जाना है
वो बोला - किस किस को निकालोगे ? अन्दर बारह खड़े हैं
हमने कहा - भाई साहब हम बहुत मुश्किल में पड़े हैं
मामला बिगड़ गया तो बंदा कहाँ जायेगा ?
वो बला - क्यूँ आपके कंधे
पे जो झोला टँगा है
वो किस दिन काम में आयेगा ...
इतने में लाइट चली गयी
बाथरूम वाला वापस अन्दर जा चुका था
हमारा झोला कंधे से गायब हो चुका था
कोई अँधेरे का लाभ उठाकर अपने काम में ला चुका था |

अचानक गाड़ी बड़ी जोर से हिली
एक यात्री ख़ुशी के मारे चिल्लाया - 'अरे चली, चली'
कोई बोला - जय बजरंग बली, कोई बोला - या अली
हमने कहा - काहे के अली और काहे के बली !
गाड़ी तो बगल वाली जा रही है
और तुमको अपनी चलती नजर आ रही है ?
प्यारे ! सब नज़र का धोखा है
दरअसल ये रेलगाडी नहीं हमारी ज़िन्दगी है
और ज़िन्दगी में धोखे के अलावा और क्या होता है ?

Saturday, August 25, 2018

मौत से ठन गई!


जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

Thursday, August 16, 2018

भारत का मस्तक नहीं झुकेगा

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्रता भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतंत्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता। 
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतंत्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है। 
औरों के घर आग लगाने का जो सपना, वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो, अपने पैरों आप कुल्हाड़ी नहीं चलाओ। 
ओ नादान पड़ोसी अपनी आंखे खोलो, आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है? तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई। 
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं, माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई ?

अमेरिकी शस्त्रों से अपनी आजादी को दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो। 
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार, अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमेरिका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध, काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा  
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।

Thursday, May 24, 2018

औरत पालने को कलेजा चाहिये

एक दिन बात की बात में
बात बढ़ गई
हमारी घरवाली
हमसे ही अड़ गई
हमने कुछ नहीं कहा,
चुपचाप सहा
कहने लगी- "आदमी हो
तो आदमी की तरह रहो
आँखे दिखाते हो
कोइ एहसान नहीं करते
जो कमाकर खिलाते हो
सभी खिलाते हैं
तुमने आदमी नहीं देखे
झूले में झूलाते हैं

देखते कहीं हो
और चलते कहीं हो
कई बार कहा
इधर-उधर मत ताको
बुढ़ापे की खिड़की से
जवानी को मत झाँको
कोई मुझ जैसी मिल गई
तो सब भूल जाओगे
वैसे ही फूले हो
और फूल जाओगे

चन्दन लगाने की उम्र में
पाउडर लगाते हो
भगवान जाने
ये कद्दू सा चेहरा
किसको दिखाते हो
कोई पूछता है तो कहते हो-
"तीस का हूँ ।"
उस दिन एक लड़की से कह रहे थे-
"तुम सोलह की हो
तो मैं बीस का हूँ।"
वो तो लड़की अन्धी थी
आँख वाली रहती
तो छाती का बाल नोच कर कहती
ऊपर ख़िज़ाब और नीचे सफेदी
वाह रे, बीस के शैल चतुर्वेदी!

हमारे डैडी भी शादी-शुदा थे
मगर क्या मज़ाल
कभी हमारी मम्मी से भी
आँख मिलाई हो
मम्मी हज़ार कह लेती थीं
कभी ज़ुबान हिलाई हो

कमाकर पांच सौ लाते हो
और अकड़
दो हज़ार की दिखाते हो
हमारे डैडी दो-दो हज़ार
एक बैठक में हार जाते थे
मगर दूसरे ही दिन चार हज़ार
न जाने, कहाँ से मार लाते थे

माना कि मैं माँ हूँ
तुम भी तो बाप हो
बच्चो के ज़िम्मेदार
तुम भी हाफ़ हो
अरे, आठ-आठ हो गए
तो मेरी क्या ग़लती
गृहस्थी की गाड़ी
एक पहिये से नहीं चलती

बच्चा रोए तो मैं मनाऊँ
भूख लगे तो मैं खिलाऊँ
और तो और
दूध भी मैं पिलाऊँ
माना कि तुम नहीं पिला सकते
मगर खिला तो सकते हो
अरे बोतल से ही सही
दूध तो पिला सकते हो
मगर यहाँ तो खुद ही
मुँह से बोतल लगाए फिरते हैं
अंग्रेज़ी शराब का बूता नहीं
देशी चढ़ाए फिरते हैं

हमारे डैडी की बात और थी
बड़े-बड़े क्लबो में जाते थे
पीते थे, तो माल भी खाते थे
तुम भी चने फांकते हो
न जाने कौन-सी पीते हो
रात भर खांसते हो
मेरे पैर का घाव
धोने क्या बैठे
नाखून तोड़ दिया
अभी तक दर्द होता है
तुम सा भी कोई मर्द होता है?
जब भी बाहर जाते हो
कोई ना कोई चीज़ भूल आते हो
न जाने कितने पैन, टॉर्च
और चश्मे गुमा चुके हो

अब वो ज़माना नहीं रहा
जो चार आने के साग में
कुनबा खा ले
दो रुपये का साग तो
अकेले तुम खा जाते हो
उस वक्त क्या टोकूं
जब थके -माँदे दफ़्तर से आते हो

कोई तीर नहीं मारते
जो दफ़्तर जाते हो
रोज़ एक न एक बटन तोड़ लाते हो
मैं बटन टाँकते-टाँकते
काज़ हुई जा रही हूँ
मैं ही जानती हूँ
कि कैसे निभा रही हूँ
कहती हूँ, पैंट ढीले बनवाओ
तंग पतलून सूट नहीं करतीं
किसी से भी पूछ लो
झूठ नहीं कहती
इलैस्टिक डलवाते हो
अरे, बेल्ट क्यूँ नहीं लगाते हो
फिर पैंट का झंझट ही क्यों पालो
धोती पहनो ना,
जब चाहो खोल लो
और जब चाहो लगा लो

मैं कहती हूँ तो बुरा लगता है
बूढ़े हो चले
मगर संसार हरा लगता है
अब तो अक्ल से काम लो
राम का नाम लो
शर्म नहीं आती
रात-रात भर
बाहर झक मारते हो

औरत पालने को कलेजा चाहिये
गृहस्थी चलाना खेल नहीं
भेजा चहिये ।"

Saturday, May 12, 2018

माँ - बाप

एक कहानी माँ बाबा की बोलो कहा से शुरू करूँ.......
पहले तो उनके श्री चरणों में शीश झुका कर नमन करूँ....
माँ-बाबा मेरे सर्व पूजनीय...भगवन पूजा बाद में....
तीनो लोक की खुशियां मिलती बस इनके आशीर्वाद में...
पापा घर की नींव है तो माँ उसमें नर्म बिछोना है....
क्या उनकी तारीफ करूँ मैं ,उनसे खुश घर का हर इक कोना है....
पापा मेहनत करते है तो माँ हिम्मत बन जाती है....
जोड़ जोड़ कर पाई पाई..बच्चो का भविष्य बनाती है.....
ख्याल रखते है पापा हमारा...जो चीज जरूरत की होती...
ला देते है इक पल में हमें...कमी किसी चीज की ना होती...
बचपन खेला इनकी गोदी में...इनको बहोत सताया है....
करी शैतानी बहोत मगर...बस इनसे लाड प्यार ही पाया है.....
डर लगता जब बचपन मे,हम इनके आँचल में छुप जाते..
साथ जो बैठे माँ-बाबा के.....हम अच्छी शिक्षा ही पाते...
खून पसीने से सींचा घर बाबा ने..माँ ने इसे संवारा दिया...
पालन पोषण कर हम बच्चो का..फिर गृहस्थ जीवन मे उतार दिया..
रहना सिखाया मिल जुलकर हम सबको,साथ साथ चलते जाना..
कैसी भी हो विकट समस्या..कभी नही तुम घबराना....
जैसे हम सब साथ रहे अब तक..आगे भी बढ़ते जाना....
दुनिया है बेरंग ये कहते...बातों में इनकी तुम मत आना...
त्याग-तपस्या माँ बाबा की बहोत कठिन...इनके कितने उच्च विचार है...
प्यार मोहब्बत ही रहे घर उनके...यही जीवन का आधार है...

Sunday, May 6, 2018

बात करो मुझसे

बात मजहब की करो तो ना करो मुझसे
बात इन्सानों की करो तो करो मुझसे।।

ये रंगों में झंडों में मेरा यकीन नही
बात तिरंगे की करो तो करो मुझसे।।

एक अदद इंसान हूँ ना हिन्दू ना मुसलमान हूँ
बात भाईचारे की करो तो करो मुझसे।।

बात तरक्की, विकास  की हो तो करो मुझसे
बात झगड़े विनाश की हो तो ना करो मुझसे।।

बात धर्म और जात की हो तो ना करो मुझसे
बात बस आवाम की हो करो मुझसे।।

बात मंदिर मस्जिद की करनी है ना करो मुझसे
बात हिंदुस्तान की करनी है तो करो मुझसे।।

Friday, May 4, 2018

कुछ कहानियाँ सुनना चाहता हूँ

जिन्दगी सौ दर्द की दास्तान होती है
हर तस्वीर से कितनी कहानियाँ बयान होती हैं।
फिर भी ऐ जिन्दगी तु बहुत खुबसुरत है
हर पल तुझे जीने की चाह रहती है।।
तेरी मुस्कुराहट पे मैं हर पल निसार होता हूँ
तेरे संग चलने को मैं हरदम तैयार रहता हूँ
ना कोई सवाल ना किसी की उल्फत है
पर जिन्दगी सच मुझे तेरी बहुत जरुरत है।।
तुझे हो न हो मुझे तुझसे बहुत प्यार है
तेरे बिना मेरा दिल सूना-सूना सा है
बिन तेरे धडकनों का सुर अधूरा है
कहने को जिन्दा हूँ पर खुशियों से दूरी है।।
चुप रहना चाहता हूँ पर अल्फाज फिसल जाते हैं
लाख रोकता हूँ पर अरमान मचल जाते हैं
कभी मेरा हाथ पकड मुझे भी साथ ले के चल
मैं तेरे धडकनों में बसना तेरे रंगो में घुल जाना चाहता हूँ।।
ऐ जिन्दगी मैं तुझे बहुत-बहुत प्यार करना चाहता हूँ....!
तेरी बाँहों में रहना तेरी आँखों में बसना चाहता हूँ
लगा ले मुझे गले से मैं धडकनों को सुनना चाहता हूँ
कुछ कहानियाँ कहना कुछ कहानियाँ सुनना चाहता हूँ।।

Wednesday, April 25, 2018

सब कह जाता है

कभी ये रो रो के अपनी बात ख़ूब सुनाता है,
कभी हँसती अँखियों से यूँ ही भी बह जाता है।
ना कहे जो बत्तीस दाँतो की पहरेदारी में जिभा,
वो ये मूक रहकर भी सब से सब कह जाता है।।

Saturday, March 17, 2018

याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन

याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।
ओलम, इमला, पाटी, बुदका खड़ियों वाले दिन
बात-बात में फूट रही फुलझड़ियों वाले दिन।
पनवाड़ी की चढ़ी उधारी
घूमें मस्त निठल्ले
कोई मेला-हाट न छूटे
टका नहीं है पल्ले
कॉलर खड़े किये
हाथों में घड़ियो वाले दिन
ट्रांजिस्टर पर हवामहल की
कड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।1।।
लिख-लिख, पढ़-पढ़ चूमें-फाड़ें
बिना नाम की चिट्ठी
सुबह दुपहरी शाम उसी की
बातें खट्टी-मिट्ठी
रूमालों में फूलों की पंखुड़ियों वाले दिन
हड़बड़ियों में बार-बार गड़बड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।2।।
सुबह-शाम की दण्ड-बैठकें
दूध पियें भर लोटा
दंगल की ललकार सामने
घूमें कसे लंगोटा
मोटी-मोटी रोटी घी कीभड़ियों वाले दिन
गइया, भैंसी
बैल, बकरियाँ पड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।3।।
दिन-दिन बरसे पानी
भीगे छप्पर आँखें मींचे
बूढ़ा दबा रही हैं झाडू
सिलबट्टा के नीचे
टोना सब बेकार जोंक, मिचकुड़ियों वाले दिन
घुटनों-घुटनों पानी फुंसी-फुड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।4।।
घर भीतर मनिहार चढ़ाये
चुड़ियाँ कसी-कसी सी
पास खड़े भइया मुसकायें
भौजी फंसी-फंसी सी
देहरी पर निगरानी करतीं बुढ़ियों वाले दिन
बाहर लाठी-मूंछें और पगड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।5।।
तेज धार करती बंजारन
चक्का खूब घुमाये
दाब दांत के बीच कटारी
मंद-मंद मुसकाये
पूरा गली-मोहल्ला घायल छुरियों वाले दिन
छुरियों-छुरियों छूट रही छुरछुरियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।6।।
‘शोले’ देख छुपा है ‘बीरू’
दरवाजे के पीछे
चाचा ढूंढ़ रहे हैं बटुआ फिर
तकिया के नीचे
चाची बेंत छुपाती घूमें छड़ियों वाले दिन
हल्दी गर्म दूध के संग फिटकरियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।7।।
ये वो दिन थे
जब हम लोफर
आवारा कहलाये
इससे ज्यादा
इस जीवन में
कुछ भी कमा न पाये
महंगाई में फिर से वो मंदड़ियों वाले दिन
कोई लौटा दे चूरन की पुड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।8।।

Friday, March 2, 2018

शब्दो से खेल रहा हूं

एक मकान को 20 आदमी 30 दिन में बनाएंगे,तो
40 आदमी कितने दिन में बनाएंगे
हमने कहा तीस दिन में ही बनाएंगे।
तो टीचर बोले
एक छोटा सा सवाल भी नही कर सकते हल
तो कक्षा से जाओ निकल
तो, हमने कहा,
मास्टरजी,मकान तुम्हारे गणित से नही बनते है
लिंटर के ढू ले 25 दिन से पहले नही खुलते है
अब तुम्ही बताओ ,बिना ढूला खुले
मकान कैसे बनाओगे
तुम्हारे हिसाब से तो अगर 100 आदमी लगा दे
तो मकान एक ही दिन में तैयार कर जाओगे
टीचर को भी बात समझ मे आई
हम पर थोड़ी नरमी खाई
फिर अगला सवाल पूछने से पूर्व
हमे दी थोड़ी नसीहत
उटपटांग उत्तर देकर
बरबाद मत करना वक्त
हमने कहा सवाल पकड़ाईये
अपना वक्त मर गवाइये
तो टीचर ने सवाल दागा
दो आदमी 50 रोटी दो घण्टे में बनाते है
इक आदमी कितने समय मे बनाएगा
हमने कहा
यदि वो आदमी कवारा है तो
चार घण्टे लगाएगा
और यदि विवाहित है तो
डेढ़ घण्टे में बनाएगा
और यदि बीवी बेलन लेकर सर पर खड़ी हो जाये
तो घण्टा भी नही लगाएगा
तो उत्तर सुनकर टीचर फिर उखड़ गए
अपनी ज्ञानदेई लेकर हम पर चढ़ गए
बोले,तेरा गणित तेरे किसी काम नही आएगा
मगर बात ठीक कहता है
इसलिए कवि बन जायेगा
तब से मास्टर जी का श्राप झेल रहा हूं
और कवि बनकर आज तक शब्दो
से खेल रहा हूं।

Tuesday, February 20, 2018

मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।


फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।
झुका हुआ सिर बैरी का, सौगात तिरंगा लाया हूँ ।
नई नवेली दुल्हन की तो, मांग पोंछ मैं आया था ।
मात-पिता को देश की खातिर, रोता छोड़ मैं आया था ।
उनके त्याग की खातिर मैं, दे मात मौत को आया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।

जगह जगह दुश्मन मेरा तो, घात लगाकर बैठा था ।
मैं भी अपने देश की खातिर, जान लगाकर बैठा था ।
समझाने से वह तो हरगिज, समझ न पाया बोली से ।
हथियार उठाकर फिर तो उसको, समझाया था गोली से ।
दुश्मन को औकात बता, मैं उसे झुकाकर आया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।

जब तक भी मैं जिंदा हूँ, इन बाजू में बल है जब तक ।
कोई दुश्मन मेरे देश को, छू न पायेगा तब तक ।
सूरज पश्चिम से यह निकले चाहे हिमालय झुक जाए ।
बहती हुई सभी नदी का प्रवाह भले ही रुक जाए ।
देशभक्ति का रुके न जज्बा, फौलाद तिरंगा लाया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।

Friday, February 16, 2018

अच्छे लगते स्वान हैं

नफरत करते इंसानों से, अच्छे लगते स्वान हैं ।
भोग लगे है पाषाणों को, भूखे मरते इंसान हैं ।
जूठन को जो ढूँढ रहे हैं, अपनी भूख मिटाने को ।
हाथ फैलाकर मांग रहे जो, कुछ भी दे दे खाने को ।
कोई बताए हमको क्या, वे भी नहीं इंसान हैं
नफरत करते इंसानों से , अच्छे लगते स्वान हैं ।

धर्म के ठेकेदार कहाँ हैं जो उन्माद फैलाते हैं ?
किस्मत के इन मारों को क्यों घर वे नहीं ले जाते हैं ?
धर्म नाम पर करें सियासत, इंसानों को बांट रहे ।
जहर पिलाकर नफरत का ये, अपने हित हैं साध रहे ।
मजलूमों के नहीं इलाही, या उनके न भगवान हैं ?
नफरत करते इंसानों से , अच्छे लगते स्वान हैं ।

जो न खाए उसे खिलाएं, आभूषण से उसे सजाएं ।
दूध से पत्थर के देवों को, नासमझे स्नान कराएं ।
भगवानों की आँखों पर, जाने कैसी परत चढ़ी है ?
उनके घर के बाहर ही, भिखमंगों की भीड़ खड़ी है ?
सम्पूर्ण जगत के मालिक क्यों, धरती पर मेहमान हैं
नफरत करते इंसानों से, अच्छे लगते स्वान हैं ।

करो परिश्रम कुछ पाने को, तभी तो कुछ मिल पाएगा
बिना परिश्रम खुदा भी तुमको कुछ भी न दे पाएगा ।
तर्क से परखो हर घटना को अपनी आंखें खोलो ।
बिन परखे ही पाखंडी की तुम, हरगिज जय मत बोलो ।
ईश नाम पर ना जाने कितने चला रहे दुकान हैं ।
नफरत करते इंसानों से , अच्छे लगते स्वान हैं ।

Wednesday, February 14, 2018

राजनीति के योद्धा

आसमान के सपने देकर छीन धरातल लेते हैं ।
राजनीति के योद्धा हमको कष्ट बड़ा ही देते हैं ।
बातों से ही मन भरते हैं बातों में उपबंध करें ।
मिले निवाला हर मानव को नहीं ऐसा प्रबंध करें ।
करके बातें बड़ी बड़ी वे सिंहासन पा लेते हैं ।
राजनीति के योद्धा हमको कष्ट बड़ा ही देते हैं ।

करें बुराई प्रतिद्वंदी की खुद की प्रशंसा खूब करें ।
दूजा भी है समर्थ आदमी हरगिज न मंजूर करें ।
चित भी इनकी पट भी इनकी अंटा इनके बाबा का ।
पांच साल तक जनता लेती घंटा इनके बाबा का ।
दोनों हाथों खूब तिजोरी अपनी ये भर लेते हैं ।
राजनीति के योद्धा हमको कष्ट बड़ा ही देते हैं ।

सभी बड़े ओहदों पर बैठे इनके भाई भतीजे हैं ।
जांच घोटालों की होती पर मिलते नहीं नतीजे हैं ।
जज व थानेदार भी तो मिलकर ही रहते हैं इनसे ।
कोई बेचारा अपनी विपदा आखिर कह दे किनसे ?
जैसा ये आदेश करें वे वैसा ही कर देते हैं ।
राजनीति के योद्धा हमको कष्ट बड़ा ही देते हैं ।

पांच साल के बाद जब समय चुनाव का आता है ।
शेर सा दिखने वाला नेता पूँछ हिलाता आता है ।
जाति और धर्म का शस्त्र ये तो भरपूर चलाते हैं ।
अपनी जीत की खातिर ये तो बलवे तक करवाते हैं ।
नियम कायदे सारे ये तो टाँग खूँट पर देते हैं ।
राजनीति के योद्धा हमको कष्ट बड़ा ही देते हैं ।

Friday, February 9, 2018

बिवी और हम !


वो तो हमारे लिये जमानेसे लड जाती है और
एक हम है जो जमाने के लिये उससे लड जाते है ।
वह तो सारे जमाने का प्यार हमपे लुटाती है और
एक हम है जो सारे जमाने के लिये उसको रूलाते है ।
वह तो सारी दुनिया से बाते कर लेती है और
एक हम है जो खुदसेभी दुरी बनाके बैठे है ।
वह पल पल जिंदगी का लुफ्त उठाती है और
एक हम है जो खुशियोमेभी उदास बैठे रहते है ।
वह हसती रोती भी है वह चिखती चिल्लाती भी है और
एक हम है जो हर वखत अपने आप मे उलझे रहते है ।

Sunday, January 28, 2018

पुरुष- एक अनकहा चरित्र

क्यों जग में पुरुष का पर्याय ही दंभ है
क्या ये सत्य नही???
स्त्री संग पुरुष भी सृष्टि का आरंभ है
माना दोंनो की नियति समान नही
स्त्री होना दुष्तर है तो पुरुष होना भी आसान नही..
अक्सर पुरुष की कथा व्यथा
अनकही रह जाती है
पुरुष चरित्र और उसकी भूमिका
अभिव्यक्ति नही पाती है
हर रिश्ते हर चरित्र में...
दायित्व पुरुष का विधान है
स्त्री धन्य धन्य है
तो पुरुष भी महान है
पुरुष जब पुत्र रूप में आता है
दायित्व और उम्मीदें साथ लाता है
माँ कहती बुढ़ापे का सहारा है
पिता कहते कुलदीपक हमारा है
पुरुष जब परिश्रम करने जाता है
जीवन को दुष्तर रूप में पाता है
स्वयं को स्वर्ण सा निखारने
वो हर कसौटी पर बंध जाता है
और जब पति का रूप होता है
पुरुष प्रकृति के समीप होता है
मैं और तुम से ""हम"" के सफर में
वो दो हथेलियों का एक नसीब होता है
जब यही पुरुष पिता बन जाता है
बच्चों की सारी उम्मीदे बन जाता है
भूल कर अस्तित्व अपना
उनके ही स्वपनों में ढ़ल जाता है
पुरुष चरित्र के कई रूप है
जैसे स्त्री के कई स्वरुप हैं
बहन का बल है, भाई का संबल है
वो तटस्थता से बहता प्रेम अविरल है
पुरुष दायित्वों का मुस्कुराता निर्वहन है
परिवार को छाँव देता वटवृक्ष सा सघन है
पुरुष सबल है ,संस्कार है, साहस है ,सक्षम है
रण में अट्टाहस करने वाला
शत्रु को परास्त करने वाला
केवल स्वयं की, भाव अभिव्यक्ति में अक्षम है
लेकिन उसके मौन में भी
प्रेम है ,पीड़ा है ,परेशानी है
स्त्री यदि मुखर गाथा है
तो पुरुष अनकही कहानी है

Friday, January 26, 2018

दिल पर मेरे बना तिरंगा

दिल पर मेरे बना तिरंगा, नक्शा हिन्दुस्तान है ।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई, सब इसकी संतान हैं
पुष्पित इन पुष्पों से होता, भारत देश महान है ।

रंग बिरंगे फूल यहाँ पर, धर्मों की शाखाओं पर ।
देशभक्त हैं लोग यहाँ के, नाज हमें माताओं पर ।
उद्धम और भगत सिंह जैसे, हीरों की यहाँ खान है।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।

जब जब भी मेरे देश को, दुश्मन ने ललकारा है ।
तब तब हमने उसको उसके, घर में घुसकर मारा है ।
आसमान में उड़े तिरंगा, हम सबका अभिमान है ।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।

अपनी धुन के पक्के हैं हम, अपनी शान निराली है ।
पर्वत के सीने में भी हमने तो राह बना ली है ।
कठिन राहें हों चाहे जितनी, हमें लगें आसान हैं ।
इस दुनिया में सबसे सुंदर, मेरा हिन्दुस्तान है ।

Monday, January 22, 2018

बसंत का आगमन

आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
पुष्पों की महक से, सबको है महका गया ।
तितलियां आई हैं, अब फूलों को चूमने ।
भ्रमर भी लग गये, अब बिना वजह घूमने ।
विहगों का चहकना, सबको है हर्षा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
नर और नारी क्या, अब सभी पर खुमार है ।
बह रही चहुंओर , प्रीत की ही बयार है ।
प्रीत की बयार का , नशा सभी पर छा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
पुष्पों के बोझ से, झुकी हुई हैं डालियाँ ।
दानों से अब सभी, भरी हुई हैं बालियां ।
खुशियों के रंग यह, जीवन में बिखरा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।
काश ! यह बसंत तो महके यूं हर रोज ही ।
फिर तो हम सभी की, होगी हरदम मौज ही ।
अधरों पर मुस्कान, यह सबके बिखरा गया ।
आगमन बसंत का, सबके मन को भा गया ।

Sunday, January 21, 2018

पत्नी बोले, हिम्मत डोले

न पूछो हाल इस दिल की,
जख्म हम कैसे ढ़ोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,.......
बदन पे उनके हैं गहने,
पुराने शर्ट हम पहने,
पड़े हैं डाँट भी सहने,
गुलाम लगे लोग भी कहने,
हे भगवन ! आ तु धरती पर,
देख आँसू कैसे धोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,.......
मिला है जब राशन का बिल,
हम खुद दर दर भटकते हैं,
सुन सुन के भाषण धड़के दिल,
हम खुद ही सर पटकते हैं,
ये शादी बस भुलावा है,
हम पिंजरे के बस एक तोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,....
सुबह से शाम तक अफसर,
पिलाते डाँट ही अक्सर,
मैं लेटूँ थककर जा बिस्तर,
बुलाती आलसी कहकर,
अब बच्चे बोले सब मिलकर,
क्यूँ बापू आपा खोते हैं,
क्या बोलूँ बातें हर पल की,
हम खुशियाँ कैसे खोते हैं,…

Wednesday, January 10, 2018

बन जाती है हिन्दी


अक्षर - अक्षर के मिलने से, शब्दों का संसार बने ।
भाषाओं की दुनिया में, बिन हिन्दी ना काम बने ।
हिन्दी रस में जब हम डूबे, हमने तो यह पाया है ।
शब्दों के महासागर में, खूब नहाती है हिन्दी ।

अँग्रेजी, रूसी, चीनी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी हैं।
भाषारूपी दुनिया में, कितनी ही महारानी हैं ।
सब भाषाओं को जब परखा, हमने तो यह पाया है ।
महारानियों की महफिल में, बस पटरानी है हिन्दी ।

विज्ञान जगत का गूढ रहस्य, हिन्दी में समाया है ।
सम्पूर्ण जगत ने हिन्दी सहित्य, अनुवादित करवाया है ।
पढ़ - पढ़ हिन्दी साहित्य को हमने तो यह पाया है ।
दीप ज्ञान का सदा जलाती, तिमिरनाशिनी है हिन्दी ।

आड़ी-सीधी रेखाओं से, बनते शब्द निराले हैं ।
क, ख, ग, घ के मिलने से, अर्थ बड़े रसवाले हैं ।
लिखकर देखा जब हिन्दी में , हमने तो यह पाया है ।
कुछ भी लिखो यारों तुम तो, बस बन जाती है हिन्दी ।

Sunday, January 7, 2018

समंदर

दिल जीत लूं वो नजर मैं भी रखता हूँ
भीड़ में नजर आओ वो हुनर भी रखता हूँ
वादा किया है मुस्कुराने का वर्ना
इन आँखों में समंदर मैं भी रखता हूँ

Friday, January 5, 2018

नया साल

आज श्रीमति जी और बच्चों का वार्तालाप
मेरे कानों में भी पड़ गया अपने आप,
वो कह रही थी कि तुम्हारे पापा भी
बिल्कुल लड़के लगते थे कभी,
"थे" शब्द सुनके लगा जैसे
आकाश से बिजली तड़तड़ा कर
और गिरी हो मेरे ऊपर आकर।
और हो गया मैं बेहोश
जब थोड़ी देर बाद आया होश,
तो थोड़ा दिमाग लगाया
और मैंने ये पाया,
कि हम हर बार ,,,,,,,,हर साल
स्वागत करते हैं, मनाते हैं, नया साल,
और ये नया साल,, हमे क्या देता हैं
हमे एक साल और ,,,बूढ़ा बना देता है।
बहुत से लोग नही रखते होंगे इतेफाक
कह रहे हैं बूढा होगा तू और तेरा बाप,
हम तो जवान हैं और
ख्यालों से तो पूछिये मत ,,कितने ज्यादा
भले ही मुह में दाँत नही
और चने खाने का ,,रखते हैं इरादा।
युवा रहने की चाहत बात अच्छी है
लेकिन ये बात भी उतनी ही सच्ची है,
कि वक्त सदैव रहता है गतिमान
और इसकी गाड़ी में
सफर करता है हर इंसान।
वर्तमान की मशीन में
भविष्य एक कच्चा माल है
जो बदलता है अतीत के उत्पाद में
जैसे बीता हुआ साल है।
हर किसी को बूढापा आना है
और फिर एक दिन
दुनिया से गोल हो जाना है,
मगर इसमे क्या गम है
ये तो सृष्टि का नियम है।
तो मेरे दोस्तों वर्तमान के
इन पलो को जियो यूँ जी भर के
कि जब जाओ अतीत में
तो आये ये सुनहरी यादे उभर के,
और जब भी ये आपको याद आये
तो आप रह ना सको बिना मुस्कुराये।

Monday, January 1, 2018

कहानी – हर साल की

जनवरी आता है , नयी उम्मीदों को पंख लगाता है,
फरवरी फर्र फर्र न जाने कब बीत जाता है ,
मार्च सुहाना मौसम लेकर आता है,
उम्मीदों को परवाज देते देते पहला तिमाही गुजर जाता है।
अप्रैल में चहुँओर फूल खिल जाते है ,
मई में सूरज देवता आग बरसाते है ,
जून का महीना पसीना पोछने में बीत जाता है,
आधा साल यूँ ही रीत जाता है।
जुलाई में रिमझिम मानसून बरसता है ,
अगस्त में नदी – नालो में उफान होता है ,
सितम्बर नयी अंगड़ाई लाता है ,
साल के नौ महीने बीत गए – धीरे से कहता है।
अक्टूबर में पेड़ो के पत्ते साख से झड़ जाते है ,
नवंबर में त्यौहार शुरू हो जाते है ,
दिसम्बर फिर सर्द हो जाता है ,
एक साल यूँ ही बीत जाता है।
हर साल कुछ दे जाता है ,
हर साल कुछ ले जाता है ,
समय का चक्र है ,
वक्त का पहिया चलता जाता है।