Sunday, October 25, 2015

तमाशा

अब मैं आपको
कोई कविता नहीं सुनाता
एक तमाशा दिखाता हूं,
और आपके सामने
एक मजमा लगाता हूं।
ये तमाशा
कविता से बहुत दूर है,
दिखाऊं साब, मंज़ूर है?
कविता सुननेवालो
ये मत कहना
कि कवि होकर
मजमा लगा रहा है,
और कविताएं सुनाने के बजाय
यों ही बहला रहा है।
दरअसल
पापी पेट का सवाल है
और देश का ये हाल है
कि कवि अब
मजमा लगाने को मजबूर है,
तो दिखाऊं साब, मंज़ूर है?
बोलिए जनाब
बोलिए हुज़ूर,
तमाशा देखना मंज़ूर?
थैंक्यू, धन्यवाद, शुक्रिया,
आपने 'हां' कही
बहुत अच्छा किया।
आप अच्छे लोग हैं
बहुत अच्छे श्रोता हैं
और तमाशबीन भी ख़ूब हैं,
देखिए मेरे हाथ में
ये तीन टैस्ट-ट्यूब हैं।
कहां हैं!!!
ग़ौर से देखिए
ध्यान से देखिए,
मन की आंखों से
कल्पना की पांखों से देखिए
देखिए यहां हैं।
क्या कहा, उंगलियां हैं?
नहीं-नहीं टैस्ट-ट्यूब हैं
इन्हें उंगलियां मत कहिए
तमाशा देखते वक़्त
दरियादिल रहिए।
आप मेरे श्रोता हैं, पाठक हैं
रहनुमा हैं, सुहाग हैं
मेरे महबूब हैं
अब बताइए ये क्या हैं?
--तीन..... टैस्ट-ट्यूब हैं।
वैरी गुड, थैंक्यू
धन्यवाद, शुक्रिया
आपने उंगलियों को
टैस्ट-ट्यूब बताया
बहुत अच्छा किया।
अब बताइए इनमें क्या है
बताइए-बताइए
इनमें क्या है?
अरे, आपको क्या हो गया है?
टैस्ट-ट्यूब दिखती है
अंदर का माल नहीं दिखता है,
आपके भोलेपन में भी
अधिकता है।
ख़ैर छोड़िए
ए भाईसाहब!
अपना ध्यान इधर मोड़िए।
चलिए, मुद्दे पर आता हूं,
मैं ही बताता हूं
इनमें ख़ून है!
हां भाईसाहब
हां बिरादर,
हां माई बाप
हां गॉड़फ़ादर!
इनमें ख़ून है।
पहले में हिंदू का
दूसरे में मुसलमान का
तीसरे में सिख का ख़ून है,
और इन तीनों में ही
बड़ा जुनून है।
आप में से जो भी
इनका फ़र्क़ बताएगा
मेरा आज का
पारिश्रमिक ले जाएगा।
हर किसी को
बोलने की आज़ादी है,
खरा खेल फ़रक्खाबादी है।
न जालसाज़ी है न धोखा है,
ले जाइए, पूरा पैसा ले जाइए
जनाब, मौक़ा है।
फ़र्क़ बताइए,
तीनों में अंतर क्या है
अपना तर्क बताइए,
और एक कवि का
पारिश्रमिक ले जाइए।
आप बताइए
नीली कमीज़ वाले साब,
सफ़ेद कुर्ते वाले जनाब।
आप बताइए
जिनकी इतनी बड़ी दाढ़ी है।
आप बताइए बहन जी
जिनकी पीली साड़ी है।
संचालक जी आप बताइए
आपके भरोसे हमारी गाड़ी है।
इनके मुंह पर नहीं
पेट में दाढ़ी है।
ओ श्रीमान जी,
आपका ध्यान किधर है,
इधर देखिए
तमाशे वाला तो इधर है।
हां, तो
दोस्तो!
फ़र्क़ है,
ज़रूर इनमें फ़र्क़ है,
तभी तो
समाज का बेड़ाग़र्क है।
रगों में शांत नहीं रहता है,
उबलता है
धधकता है
फूट पड़ता है
सड़कों पर बहता है।
फ़र्क़ नहीं होता
तो दंगे-फ़साद नहीं होते,
फ़र्क़ नहीं होता
तो ख़ून-ख़राबों के बाद
लोग नहीं रोते।
अंतर नहीं होता
तो गर्म हवाएं नहीं होतीं,
अंतर नहीं होता
तो अचानक विधवाएं नहीं होतीं।
देश में हर तरफ़
हत्याओं का मानसून है,
ओलों की जगह
हड्डियां हैं
पानी की जगह ख़ून है।
फ़साद करने वाले ही बताएं
अगर उनमें थोड़ी-सी हया है,
क्या उन्हें सांप सूंघ गया है?
और ये तो मैंने आपको
पहले ही बता दिया
कि पहली में हिंदू का
दूसरी में मुसलमान का
तीसरी में सिख का ख़ून है।
अगर उल्टा बता देता
तो कैसे पता लगाते,
कौन-सा किसका है
कैसे बताते?
और दोस्तो,
डर मत जाना अगर डरा दूं,
मान लो मैं इन्हें
किसी मंदिर, मस्जिद
या गुरुद्वारे के सामने गिरा दूं,
तो है कोई माई का लाल
जो फ़र्क़ बता दे,
है कोई पंडित
है कोई मुल्ला
है कोई ग्रंथी
जो ग्रंथियां सुलझा दे?
फ़र्श पर बिखरा पड़ा है
पहचान बताइए,
कौन मलखान, कौन सिंह
कौन ख़ान बताइए!
अभी फ़ोरैन्सिक विभाग वाले आएंगे
जमे हुए ख़ून को
नाख़ून से हटाएंगे,
नमूने ले जाएंगे।
इसका ग्रुप 'ओ'
इसका 'बी'
और उसका 'बी प्लस' बताएंगे।
लेकिन ये बताना
क्या उनके बस का है,
कि कौन-सा ख़ून किसका है!
क़ौम की पहचान बताने वाला
जाति की पहचान बताने वाला
कोई माइक्रोस्कोप है?
वे नहीं बता सकते
लेकिन मुझे आप से होप है।
बताइए, बताइए,
और एक कवि का
पारिश्रमिक ले जाइए।
अब मैं इन परखनलियों को
स्टोव पर रखता हूं
उबाल आएगा,
ख़ून खौलेगा
बबाल आएगा।
हां, भाईजान
नीचे से गर्मी दो न
तो ख़ून खौलता है
किसी का ख़ून सूखता है
किसी का जलता है
किसी का ख़ून थम जाता है,
किसी का ख़ून जम जाता है।
अगर ये टैस्ट-ट्यूब
फ्रिज में रखूं
ख़ून जम जाएगा,
सींक डालकर निकालूं
तो आइस्क्रीम का मज़ा आएगा।
आप खाएंगे ये आइस्क्रीम?
आप खाएंगे,
आप खाएंगी बहन जी
भाईसाहब आप खाएंगे?
मुझे मालूम है कि
आप नहीं खा सकते
क्योंकि इंसान हैं,
लेकिन हमारे मुल्क़ में
कुछ मज़हबी हैवान हैं।
साम्प्रदायिक दरिन्दे हैं,
जिनके बस ख़ून के ही धंधे हैं।
वो खाते हैं ये आइस्क्रीम
मज़े से खाते हैं,
भाईसाहब बड़े मज़े से खाते हैं,
और अपनी हवस के लिए
आदमी-से-आदमी को लड़ाते हैं।
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है,
इन्हें मीठी लोरियों का
सुर नहीं भाता है।
मांग के सिन्दूर से
इन्हें कोई मतलब नहीं
कलाई की चूड़ियों से
इनका नहीं नाता है।
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
इनके अंदर
धर्म की मांद से निकला
स्वार्थों का
ख़ूंख़ार भेड़िया ग़ुर्राता है,
क़ौमी कोबरा
जीभ लपलपाता है,
अच्छे भले लोगों में
ज़हर फैलाता है।
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
अरे गुरु सबका
गॉड सबका
ख़ुदा सबका
और सबका विधाता है,
लेकिन इन्हें तो
अलगाव ही सुहाता है,
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
मन्दिर के आगे
टूटी हुई चप्पलें
मस्जिद के आगे
बच्चों के बस्ते
गुरु के द्वार पर
बम और गोले,
कोई इन्हें क्या बोले?
इनके सामने
शासन भी सिर झुकाता है,
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
हां तो भाईसाहब!
कोई धोती पहनता है
कोई पायजामा
किसी के पास पतलून है,
लेकिन हर किसी के अंदर
वही ख़ून है।
साड़ी में मां जी
सलवार में बहन जी
बुर्क़े में ख़ातून है,
सबके अन्दर वही ख़ून है,
तो वयों अलग विधेयक हैं
क्यों अलग क़ानून है?
ख़ैर छोड़िए
आप तो ख़ून का फ़र्क़ बताइए,
अंतर क्या है
अपना तर्क बताइए।
क्या पहला पीला
दूसरा हरा
तीसरा नीला है
जिससे पूछो यही कहता है
कि सबके अंदर
वही लाल रंग बहता है।
और यही इस तमाशे की टेक है,
कि रगों में रहता हो
या सड़कों पर बहता हो
लहू का रंग एक है।
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है
कि अलग-अलग
टैस्ट-ट्यूबों में है,
अंतर ख़ून में नहीं है
मज़हबी मंसूबों में है।
और अब मैं जाता हूं,
लेकिन वही पुरानी बात
दोहराता हूं,
कि लहू का रंग
जब एक है- लाल है
तो एक मां के
लालों की तरह रहें,
वक़्त के आवारा बहाव में न बहें।
मज़हब जात, बिरादरी
और ख़ानदान भूल जाएं
ख़ूनदान पहचानें
कि किस ख़ूनदान के हैं,
इंसान के हैं कि हैवान के हैं?
और इस तमाशे वाले की
अंतिम इच्छा यही है कि
ख़ून सड़कों पर न बहे,
वह तो धमनियों में दौड़े
और रगों में रहे।
ख़ून सड़कों पर न बहे
ख़ून सड़कों पर न बहे
ख़ून सड़कों पर न बहे।

Thursday, October 22, 2015

रावण हमें जलाना है

फिर से राम हुए बनवासी,
छायी सब पर आज उदासी
लक्ष्मण के पांवों में छाले,
फिर से समय-चक्र ने डाले।
रावण करता है मनमानी,
छलता सीता को अज्ञानी
हर रावण के अब विरोध में
हमको शोर उठाना है,
रावण हमें जलाना है।

कोई सोये यहां टाट पर,
कोई मखमल और खाट पर।
कोई खाता बालूशाही,
भूख मचाती कहीं तबाही|
कहीं मनाते लोग दीवाली,
कहीं बसी हैं रातें काली|
कैसे भी हो, भेदभाव यह
अब तो हमें मिटाना है,
रावण हमें जलाना है।