Wednesday, December 27, 2017

हाँ इस देश का वासी हूँ

हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा
जीने का दम रखता हूँ, तो मरकर भी दिखलाऊंगा।
नज़र उठा कर न देखना, ऐ दुश्मन मेरे देश को
मरूँगा मैं जरूर पर, तुझे मार कर हीं जाऊंगा।
कसम मुझे इस माटी की, कुछ ऐसा मैं कर जाऊंगा
हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा।।

मेरे हौसले न तोड़ पाओगे तुम
क्योंकि मेरी शहादत हीं अब मेरा धर्म है।
ऐ मेरे देश के नौजवानों अब आंसू न बहाओ तुम
सेनानियों की शहादत का अब कर्ज चुकाओ तुम।
उठो तुम भी और मेरे साथ कहो, कुछ ऐसा मैं भी कर जाऊंगा
हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा।।
ऐ देश के दुश्मनों ठहर जाओ

आंच आई मेरे देश पर तो खून मैं बहा दूंगा।
माया में फंसकर तो मरता हीं है हर कोई
पर तिरंगे को कफ़न बना कर मैं शहीद कहलाऊंगा
हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा।।

खून खौलता है मेरा, जब वतन पर कोई आंच आती है
कतरा कतरा बहा दूंगा, दिल से आवाज आती है।
इस माटी का बेटा हूँ मैं, इस माटी में ही मिल जाऊंगा
आँख उठा के देखे कोई, सबको मार गिराऊंगा।
भारत का मैं वासी हूँ, अब चुप नहीं रह पाउँगा
अब चुप नहीं रह पाउँगा, अब चुप नहीं रह पाउँगा।।

Tuesday, December 26, 2017

आज मेरा मन विचलित है

सागर मुझसे बात करो तुम
आज मेरा मन विचलित है
मुझको सवाल कुछ करने हैं
मनके रीते घर भरने है
कितनी नदियां मीठी पीकर
कैसे खारे रह पाते हो
तेरी ये कैसी नियत है
आज मेरा मन विचलित है
जाने कितनी नाव डुबोई
कितनी आंखे इस पर रोई
क्या तेरा दिल भी ना पिघला
इतनी जानें ले लेकर भी
दिखता तू कितना संयत है
आज मेरा मन विचलित हैै
सागर माना मोती तुझमें
और जाने है क्या क्या
पर इतना होकर भी तुझमें
कुछ नही है मीठा सा
दिल इस बात से आहत है
आज मेरा मन विचलित है
मेरे अंदर भी इक सागर
रोज हिलोरें लेताहैं
जब भी मेरी आँखें बरसें
खारा पानी मिलता है
पर खारी ना नियत है
आज मेरा मन विचलित है
सागर मुझसे बात करो तुम
आज मेरा मन विचलित है

Sunday, December 24, 2017

मानव सेवा रब की पूजा


बीच बाजार एक आदमी गिरकर मर गया ,
सारे शहर में आम यह चर्चा हो गया ।
कोई कफन, तो कोई पैसा दे गया,
प्रबंध उसके क्रियाकर्म का हो गया ।

अर्थी पर जब उसको लिटाकर ले जाने लगे,
रास्ते में बारिश के छीटें आने लगे ।
पानी ज्यों मुँह पर पड़ा, मुर्दा हरकत करने लगा ।
भूख से बेहोश हुआ था, रोटी-रोटी रटने लगा ।

देखकर मुर्दे में हरकत, लोग दहशत खाने लगे ।
बिना सोचे समझे ही, भूत-भूत चिल्लाने लगे ।
सुनकर नाम भूत का, लोगों में भगदड़ मच गई ।
किसी का जूता-चप्पल छूटा, किसी की धोती खुल गई ।

देखने को उसको फिर, कोई भी वहां ना रहा ।
जीवित रहने का उसके, यह अवसर भी जाता रहा ।
रोटी-रोटी करता वह तो, राम-राम कर गया ।
कुछ ही पलों में वह तो, सचमुच का मुर्दा बन गया ।

कोई यहाँ रोटी को तरसे, कहीं अन्न सडे गोदामों में ।
पैसे-पैसे को मोहताज कोई, कोई उड़ाये व्यर्थ के कामों में ।
मालिक सद्बुद्धि दो तुम, उन लाला साहूकारों को ।
धन-दौलत बाँटें दुखियों में, प्यार तेरा वे पाने को ।

ईश्वर भी खुश होता है, सेवा से इंसान की ।
मानव सेवा रब की पूजा, कहते वेद-कुरान भी ।

Saturday, December 23, 2017

हर कोई बस परखता है

कभी माँ, कभी बीवी बनकर बलि की देवी बनती है
नौ महीने गर्भ के बीज को पल- पल खून से सींचती है
नव कोपल के फूटने के लम्बे इन्तजार को झेलती है
कौन आगे बढकर प्यार से माथे का पसीना पौंछता है ?
नवजीव के खिलने के असहनीय दर्द को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

माँ बनकर अपने जिगर के टुकड़े को हर दिन बढ़ते देखती है
कभी प्यार से तो, कभी डांट से पुचकारती है
खुद भूखा रहकर भी हर एक का पेट भरती है
कभी रात का बचा भात तो ,कभी दिन की बची रोटी रात में खाती है
इस बलिदान को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

कभी पति, कभी बच्चों की दूरी को कम करते पिस जाती है
बच्चें लायक हो तो पिता का सीना गर्व से फूलता है
परीक्षा में कम निकले तो हर कोई माता को कोसता है
हम सफ़र के माथे की हर शिकन को तुरंत भांप लेती है
इस ममता को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

कभी बेटी, कभी बहन बनकर सब सह जाती है
कभी बाप , कभी भाई के गुस्से में भी मुस्कुराती है
मायके में बचपन के आँगन का हर कर्ज चुकाती है
अपने हर गम, हर दुःख में भी सबका गम भुलाती है
इस दुलार को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

कभी प्रेमिका बनकर, कभी दोस्ती के नाम पर छली जाती है
खुद गुस्सा होकर भी अपने प्रेमी को हर पल मनाती है
प्रेमी के मन की हर बात बिन कहे समझ जाती है
अपना हर आंसू उससे छुपा लेती है
कभी उसकी याद में तो, कभी बेरुखी में तड़पती है
इस जलन को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !

कभी बहू बनकर दहेज़ के नाम पर ताने सह जाती है
बेटी पैदा करने पर गुनाहगार ठहराई जाती है
कभी प्रसव तो , कभी गर्भ -पात की पीड़ा झेल जाती है
अपने ही अरमानों की अर्थी अपने कांधो पर उठाती है
इस संवेदना को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !

Wednesday, December 13, 2017

नेता सब कुछ भूल गये


संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।
समता का मतलब भी शायद, वे तो अब हैं भूल गये ।
कानूनों में खामी है या, शासन की नाकामी है ।
कारण कुछ भी हो चाहे, यह हम सबकी बदनामी है ।
जिनको मिलना था उनको ही, हक क्यों देना भूल गये ।
संविधान तो समता देता, नेता सबकुछ भूल गये ।

समाजवाद देखा है हमने, किताबों में ही मिलता है ।
समाजवाद का पुष्प मगर, सच में कभी न खिलता है ।
गरीब और भिखारी आखिर, क्यों बढ़ते ही जाते हैं ?
उनके हिस्से का धन आखिर, शासक कहाँ लुटाते हैं ?
जो भी नेता चुनकर आते, वे कैसे फल-फूल गये ?
संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।

रोटी के हैं किसी को लाल, कोई मजे उड़ाता है ।
पानी नहीं नसीब किसी को, कोई जाम छलकाता है ।
पशु की भांति जूठन खाते, हमने लोगो को देखा ।
कैसे मिट गई आखिर उनके, सुख वाले दिन की रेखा ?
भूखे जाने कितने मर गये, कुछ खुद ही फाँसी झूल गये ।
संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।

अच्छे दिन का वादा करते, नेता बड़े हरामी हैं ।
हम ही उनको चुनकर लाते, अपनी ही यह खामी है ।
जैसे मारा लुई सौलहवां, ऐसा ही कुछ कर डालो ।
भ्रस्टाचारी हर नेता की, ख़त्म कहानी कर डालो ।
तुमको ही अब कुछ करना है, करने वाले भूल गये ।
संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।

Tuesday, December 12, 2017

निशानी

कभी प्रेम को पूजा तो कभी कहानी कहा गया।
मीरा को पुजारन राधा को दिवानी कहा गया।
किसी ने बना लिया तेरी यादों को जीने की वजह।
कही तेरी यादों को जीने की निशानी कहा गया।

Sunday, December 10, 2017

मुझे पूजना उसको आता


मुझे पूजना नहीं है आता, क्या मस्जिद और देवाला है ।
मुझे पूजना उसको आता, जो भारत का रखवाला है ।
धर्म नहीं उसका कोई भी, बस देश धर्म पर मरता है ।
अगर जरूरत आन पड़े तो, बलिदान देश पर करता है ।
उसके आगे कितना छोटा, लगता यह हिमाला है ।
मुझे पूजना उसको आता, जो भारत का रखवाला है ।

जन्म दिया है जिस माँ ने, मैं उसको शीश झुकाता हूँ ।
चरण जहाँ पर उसके पड़ते, मैं तो अर्घ्य चढ़ाता हूँ ।
जिसने छाती से दूध पिलाकर, उसको वज्र बनाया है ।
वह बेटा ही सैनिक बनकर, काम देश के आया है ।
भारत माँ ने शूरवीर यह, बड़े ही नाज से पाला है ।
मुझे पूजना उसको आता, जो भारत का रखवाला है ।

पतिव्रता इसकी जो नारी, उसको भी शीश झुकाता हूँ ।
त्यागमूर्ति के बलिदानों की मैं गौरवगाथा गाता हूँ ।
जब जब भी इसका साजन चिरनिद्रा में सो जाता है ।
तब तब भार देशरक्षा का इस पर ही आ जाता है ।
शस्त्र उठाकर बन वीरांगना इसने ही देश संभाला है ।
मुझे पूजना उसको आता, जो भारत का रखवाला है ।


झंझावत में पला बड़ा है, विपदा से घबराए ना ।
आगे बढ़ता ही यह जाए, पीछे कदम हटाए ना ।
हिन्द देश के इस वासी से, बैरी भी थर्राता है ।
छिपकर वार भले ही कर ले, पर नहीं सामने आता है ।
एक हाथ में लिया तिरंगा, दूजे में शस्त्र संभाला है ।
मुझे पूजना उसको आता, जो भारत का रखवाला है ।