फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।
झुका हुआ सिर बैरी का, सौगात तिरंगा लाया हूँ ।
नई नवेली दुल्हन की तो, मांग पोंछ मैं आया था ।
मात-पिता को देश की खातिर, रोता छोड़ मैं आया था ।
उनके त्याग की खातिर मैं, दे मात मौत को आया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।
झुका हुआ सिर बैरी का, सौगात तिरंगा लाया हूँ ।
नई नवेली दुल्हन की तो, मांग पोंछ मैं आया था ।
मात-पिता को देश की खातिर, रोता छोड़ मैं आया था ।
उनके त्याग की खातिर मैं, दे मात मौत को आया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।
जगह जगह दुश्मन मेरा तो, घात लगाकर बैठा था ।
मैं भी अपने देश की खातिर, जान लगाकर बैठा था ।
समझाने से वह तो हरगिज, समझ न पाया बोली से ।
हथियार उठाकर फिर तो उसको, समझाया था गोली से ।
दुश्मन को औकात बता, मैं उसे झुकाकर आया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।
मैं भी अपने देश की खातिर, जान लगाकर बैठा था ।
समझाने से वह तो हरगिज, समझ न पाया बोली से ।
हथियार उठाकर फिर तो उसको, समझाया था गोली से ।
दुश्मन को औकात बता, मैं उसे झुकाकर आया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।
जब तक भी मैं जिंदा हूँ, इन बाजू में बल है जब तक ।
कोई दुश्मन मेरे देश को, छू न पायेगा तब तक ।
सूरज पश्चिम से यह निकले चाहे हिमालय झुक जाए ।
बहती हुई सभी नदी का प्रवाह भले ही रुक जाए ।
देशभक्ति का रुके न जज्बा, फौलाद तिरंगा लाया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।
कोई दुश्मन मेरे देश को, छू न पायेगा तब तक ।
सूरज पश्चिम से यह निकले चाहे हिमालय झुक जाए ।
बहती हुई सभी नदी का प्रवाह भले ही रुक जाए ।
देशभक्ति का रुके न जज्बा, फौलाद तिरंगा लाया हूँ ।
फूल और माला नहीं हाथ, मैं साथ तिरंगा लाया हूँ ।