क्या लिखूं ?
की वो परियों का रूप होती है
या कडकती ठण्ड में सुहानी
धूप होती हैं
वो होती हैं उदासी के हर मर्ज़ की दावा की तरह
या ओस में शीतल हवा की तरह
वो चिडियों की चेह्चाहट हैं
या के निश्चल खिलखिलाहट है
वोह आँगन में फैला उजाला हैं
या मेरे गुस्से पे लगा ताला हैं
वो पहाड की चोटी पे सूरज की
किरण है
या जिंदगी सही जीने
का आचरण है
है
वो ताकत जो छोटे से घर को महल बना दे
हैं
वो काफिया जो किसी गज़ल को मुकम्मल कर दे
वो
अक्षर जो न हो तो वर्णमाला अधूरी है
वो
जो सबसे ज्यादा जरूरी है
ये
नहीं कहूँगा की वो हर वक्त साथ साथ होती है
बेटियाँ
तो सिर्फ एक एहसास होती है
वो
मुझसे ऑस्ट्रेलिया में छुट्टियाँ
५
स्टार में डिन्नर या महंगे iPods नहीं मांगती
न
वो धीरे से पैसे पिग्गी बैंक में उडेलना चाहती है
वो
बस कुछ देर मेरे साथ खेलना चाहती है
और
मैं कहता हूँ यही
की
बेटा बहुत काम है... नहीं करूँगा तो कैसे चलेगा
मजबूरी
भरे दुनिया दारी के जवाब देने लगता हूँ
और
वो झूठा ही सही
मुझे
एहसास दिलाती है
की
जैसे सबकुछ समझ गयी हो
लेकिन
आँखें बंद करके रोती है
जैसे
सपने में खेलते हुए मेरे साथ सोती है
जिंदगी
न जाने क्यों इतनी उलझ जाती है
और
हम समझते हैं की बेटियाँ सब समझ जाती है