Thursday, September 25, 2014

डर सा लगता है

तनहा जीने की मुझको इतनी आदत हो गयी 
के अब खुद की परछाई पर गुमान सा रहता है 
देख आइना में खुद को दिल सहम उठता है 
तनहा रातों में 
अक्सर खुद की धड़कन सुनकर डर सा लगता है

Wednesday, September 24, 2014

महँगी शराब पीता हूँ

मैं उसकी आँखों से छलकी शराब पीता हूँ
फ़क़ीर हो के भी महँगी शराब पीता हूँ

तुझे देखूँ तो पहचानने में देर लगे
कभी-कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ

मुझे नशे में बहकने कभी नहीं देता
वो जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ

पराये पैसों से अय्याशियाँ नहीं की हैं
मैं जब भी पीता हूँ अपनी शराब पीता हूँ

पुराने चाहने वालों की याद आने लगे
इसीलिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ

Saturday, September 20, 2014

जंग का मैदान

कहीं मंदिरों में बजी घंटियां और मस्जिदों में आज़ान हुयी ,
कहीं बरसते बारूदों में, फिर सुलह की सड़कें सुनसान हुईं ,
वृद्ध हताश,यौवन निराश और बिलखता बचपन बेचारा ;
कैसे सुकून आये दिल को जब दुनियां जंग का मैदान हुयी !

Monday, September 1, 2014

एहसास

एहसास तेरे गम के -निकाले नहीं जाते 
अब दर्द इस दिलसे - सम्भाले नहीं जाते
गम तो बहुत है पहले से- इस दिल में 
अब नये गम इस दिल में -पाले नहीं जाते