Saturday, March 17, 2018

याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन

याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।
ओलम, इमला, पाटी, बुदका खड़ियों वाले दिन
बात-बात में फूट रही फुलझड़ियों वाले दिन।
पनवाड़ी की चढ़ी उधारी
घूमें मस्त निठल्ले
कोई मेला-हाट न छूटे
टका नहीं है पल्ले
कॉलर खड़े किये
हाथों में घड़ियो वाले दिन
ट्रांजिस्टर पर हवामहल की
कड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।1।।
लिख-लिख, पढ़-पढ़ चूमें-फाड़ें
बिना नाम की चिट्ठी
सुबह दुपहरी शाम उसी की
बातें खट्टी-मिट्ठी
रूमालों में फूलों की पंखुड़ियों वाले दिन
हड़बड़ियों में बार-बार गड़बड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।2।।
सुबह-शाम की दण्ड-बैठकें
दूध पियें भर लोटा
दंगल की ललकार सामने
घूमें कसे लंगोटा
मोटी-मोटी रोटी घी कीभड़ियों वाले दिन
गइया, भैंसी
बैल, बकरियाँ पड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।3।।
दिन-दिन बरसे पानी
भीगे छप्पर आँखें मींचे
बूढ़ा दबा रही हैं झाडू
सिलबट्टा के नीचे
टोना सब बेकार जोंक, मिचकुड़ियों वाले दिन
घुटनों-घुटनों पानी फुंसी-फुड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।4।।
घर भीतर मनिहार चढ़ाये
चुड़ियाँ कसी-कसी सी
पास खड़े भइया मुसकायें
भौजी फंसी-फंसी सी
देहरी पर निगरानी करतीं बुढ़ियों वाले दिन
बाहर लाठी-मूंछें और पगड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।5।।
तेज धार करती बंजारन
चक्का खूब घुमाये
दाब दांत के बीच कटारी
मंद-मंद मुसकाये
पूरा गली-मोहल्ला घायल छुरियों वाले दिन
छुरियों-छुरियों छूट रही छुरछुरियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।6।।
‘शोले’ देख छुपा है ‘बीरू’
दरवाजे के पीछे
चाचा ढूंढ़ रहे हैं बटुआ फिर
तकिया के नीचे
चाची बेंत छुपाती घूमें छड़ियों वाले दिन
हल्दी गर्म दूध के संग फिटकरियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।7।।
ये वो दिन थे
जब हम लोफर
आवारा कहलाये
इससे ज्यादा
इस जीवन में
कुछ भी कमा न पाये
महंगाई में फिर से वो मंदड़ियों वाले दिन
कोई लौटा दे चूरन की पुड़ियों वाले दिन।
याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन।।8।।

Friday, March 2, 2018

शब्दो से खेल रहा हूं

एक मकान को 20 आदमी 30 दिन में बनाएंगे,तो
40 आदमी कितने दिन में बनाएंगे
हमने कहा तीस दिन में ही बनाएंगे।
तो टीचर बोले
एक छोटा सा सवाल भी नही कर सकते हल
तो कक्षा से जाओ निकल
तो, हमने कहा,
मास्टरजी,मकान तुम्हारे गणित से नही बनते है
लिंटर के ढू ले 25 दिन से पहले नही खुलते है
अब तुम्ही बताओ ,बिना ढूला खुले
मकान कैसे बनाओगे
तुम्हारे हिसाब से तो अगर 100 आदमी लगा दे
तो मकान एक ही दिन में तैयार कर जाओगे
टीचर को भी बात समझ मे आई
हम पर थोड़ी नरमी खाई
फिर अगला सवाल पूछने से पूर्व
हमे दी थोड़ी नसीहत
उटपटांग उत्तर देकर
बरबाद मत करना वक्त
हमने कहा सवाल पकड़ाईये
अपना वक्त मर गवाइये
तो टीचर ने सवाल दागा
दो आदमी 50 रोटी दो घण्टे में बनाते है
इक आदमी कितने समय मे बनाएगा
हमने कहा
यदि वो आदमी कवारा है तो
चार घण्टे लगाएगा
और यदि विवाहित है तो
डेढ़ घण्टे में बनाएगा
और यदि बीवी बेलन लेकर सर पर खड़ी हो जाये
तो घण्टा भी नही लगाएगा
तो उत्तर सुनकर टीचर फिर उखड़ गए
अपनी ज्ञानदेई लेकर हम पर चढ़ गए
बोले,तेरा गणित तेरे किसी काम नही आएगा
मगर बात ठीक कहता है
इसलिए कवि बन जायेगा
तब से मास्टर जी का श्राप झेल रहा हूं
और कवि बनकर आज तक शब्दो
से खेल रहा हूं।