Tuesday, January 26, 2016

वीर

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो
चट्टानों की छाती से दूध निकालो
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो
चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे
जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है
सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है
अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे
जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है
उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
तलवार प्रेम से और तेज होती है
छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
मरता है जो एक ही बार मरता है
तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे
स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है
वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे
जब कभी अहम पर नियति चोट देती है
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है
चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे
उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है
सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!! !!

Sunday, January 24, 2016

ऐसी तैसी

हरा- भरा ये देश तुम्हारी ऐसी तैसी
फिर भी इतने क्लेश तुम्हारी ऐसी तैसी
आजादी लुट गई भांवरों के पड़ते ही
ऐसे पुजे गणेश तुम्हारी ऐसी तैसी
हमें बुढ़ापा मिला जवानी में और तुमको
जब देखो तब फ्रेश तुम्हारी ऐसी तैसी
देश बिके तो बिके ठाट से कर्जा लेकर
घूमो खूब विदेश तुम्हारी ऐसी तैसी
चन्दन लकड़ी होय जले तब चिता तुम्हारी
मर कर भी ये ऐश तुम्हारी ऐसी तैसी
पहले अपने लाल कटाओ सीमाओं पर
फिर देना उपदेश तुम्हारी ऐसी तैसी
सेना के हथियार खरीदे लेकर रिश्वत
इतने गिर गए हैश तुम्हारी ऐसी तैसी
खुद रूढ़ी से ग्रस्त विश्व को तुम क्या दोगे
मुक्ति का सन्देश तुम्हारी ऐसी तैसी
अगर एकता बची बचेंगे हम भी वरना
बिखर जाएगा देश तुम्हारी ऐसी तैसी
अगर स्वर्ग में गए वहां भी नहीं मिलेगा
इतना प्यारा देश तुम्हारी ऐसी तैसी

Friday, January 22, 2016

स्त्रीलिंग-पुल्लिंग



काका से कहने लगे ठाकुर ठर्रा सिंह
दाढ़ी स्त्रीलिंग है, ब्लाउज़ है पुल्लिंग
ब्लाउज़ है पुल्लिंग, भयंकर गलती की है
मर्दों के सिर पर टोपी पगड़ी रख दी है
कह काका कवि पुरूष वर्ग की किस्मत खोटी
मिसरानी का जूड़ा, मिसरा जी की चोटी।
दुल्हिन का सिन्दूर से शोभित हुआ ललाट
दूल्हा जी के तिलक को रोली हुई अलॉट
रोली हुई अलॉट, टॉप्स, लॉकेट, दस्ताने
छल्ला, बिछुआ, हार, नाम सब हैं मरदाने
पढ़ी लिखी या अपढ़ देवियाँ पहने बाला
स्त्रीलिंग जंजीर गले लटकाते लाला।

लाली जी के सामने लाला पकड़ें कान
उनका घर पुल्लिंग है, स्त्रीलिंग दुकान
स्त्रीलिंग दुकान, नाम सब किसने छांटे
काजल, पाउडर, हैं पुल्लिंग नाक के कांटे
कह काका कवि धन्य विधाता भेद न जाना
मूँछ मर्दा को मिली, किन्तु है नाम जनाना।

ऐसी – ऐसी सैंकड़ो अपने पास मिसाल
काकी जी का मायका, काका की ससुराल
काका की ससुराल, बचाओ कृष्णमुरारी
उनका बेलन देख कांपती छड़ी हमारी
कैसे जीत सकेंगे उनसे करके झगड़ा
अपनी चिमटी से उनका चिमटा है तगड़ा।

मंत्री, संत्री, विधायक सभी शब्द पुल्लिंग
तो भारत सरकार फिर क्यों है स्त्रीलिंग?
क्यों है स्त्रीलिंग, समझ में बात ना आती
नब्बे प्रतिशत मर्द, किन्तु संसद कहलाती
काका बस में चढे हो गए नर से नारी
कंडक्टर ने कहा आ गयी एक सवारी।

उसी समय कहने लगे शेर सिंह दीवान
तोता – तोती की भला कैसे हो पहचान
कैसे हो पहचान, प्रश्न ये भी सुलझा लो
हमने कहा कि उसके आगे दाना डालो
असली निर्णय दाना चुगने से ही होता
चुगती हो तो तोती, चुगता हो तो तोता।