Wednesday, December 13, 2017

नेता सब कुछ भूल गये


संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।
समता का मतलब भी शायद, वे तो अब हैं भूल गये ।
कानूनों में खामी है या, शासन की नाकामी है ।
कारण कुछ भी हो चाहे, यह हम सबकी बदनामी है ।
जिनको मिलना था उनको ही, हक क्यों देना भूल गये ।
संविधान तो समता देता, नेता सबकुछ भूल गये ।

समाजवाद देखा है हमने, किताबों में ही मिलता है ।
समाजवाद का पुष्प मगर, सच में कभी न खिलता है ।
गरीब और भिखारी आखिर, क्यों बढ़ते ही जाते हैं ?
उनके हिस्से का धन आखिर, शासक कहाँ लुटाते हैं ?
जो भी नेता चुनकर आते, वे कैसे फल-फूल गये ?
संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।

रोटी के हैं किसी को लाल, कोई मजे उड़ाता है ।
पानी नहीं नसीब किसी को, कोई जाम छलकाता है ।
पशु की भांति जूठन खाते, हमने लोगो को देखा ।
कैसे मिट गई आखिर उनके, सुख वाले दिन की रेखा ?
भूखे जाने कितने मर गये, कुछ खुद ही फाँसी झूल गये ।
संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।

अच्छे दिन का वादा करते, नेता बड़े हरामी हैं ।
हम ही उनको चुनकर लाते, अपनी ही यह खामी है ।
जैसे मारा लुई सौलहवां, ऐसा ही कुछ कर डालो ।
भ्रस्टाचारी हर नेता की, ख़त्म कहानी कर डालो ।
तुमको ही अब कुछ करना है, करने वाले भूल गये ।
संविधान तो समता देता, नेता सब कुछ भूल गये ।

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