Tuesday, December 26, 2017

आज मेरा मन विचलित है

सागर मुझसे बात करो तुम
आज मेरा मन विचलित है
मुझको सवाल कुछ करने हैं
मनके रीते घर भरने है
कितनी नदियां मीठी पीकर
कैसे खारे रह पाते हो
तेरी ये कैसी नियत है
आज मेरा मन विचलित है
जाने कितनी नाव डुबोई
कितनी आंखे इस पर रोई
क्या तेरा दिल भी ना पिघला
इतनी जानें ले लेकर भी
दिखता तू कितना संयत है
आज मेरा मन विचलित हैै
सागर माना मोती तुझमें
और जाने है क्या क्या
पर इतना होकर भी तुझमें
कुछ नही है मीठा सा
दिल इस बात से आहत है
आज मेरा मन विचलित है
मेरे अंदर भी इक सागर
रोज हिलोरें लेताहैं
जब भी मेरी आँखें बरसें
खारा पानी मिलता है
पर खारी ना नियत है
आज मेरा मन विचलित है
सागर मुझसे बात करो तुम
आज मेरा मन विचलित है

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